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OM SAI RAM. This is an open Forum for sharing your experiences and SAI LEELAS with the whole world. We request all the Sai Devotees to join hands and spread the light of SRI SAI BABA all over the world. JAI SAI RAM

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Contributor Topic: Shirdi Diary (Khaparde's Daily Diary) in Hindi  (Read 780 times)
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Tana
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« on: January 28, 2010, 08:17:14 PM »
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ॐ साईं राम!!!

Khaparde's Shirdi Diary~~~खापर्डे शिरडी डायरी~~~

~माननीय श्री गणेश श्रीकृष्ण खापर्डे जी के शिरडी निवास के समय लिखी गयी नियमित डायरी~~
{ १८५४ - १९३८ }


शिरडी में एक सप्ताह का वास्तव्य~~~
५ दिसम्बर १९१०


शाम के लगभग चार बजे हम शिरडी पहुँचें | हम रावबहादुर साठे द्वारा लोगों की सुविधा के लिए बनवाए वाड़े में ठहरे | माधव राव देशपांडे बहुत मददगार
हुए उनहोंने हमारी सहायता की और हमारा अतिथि की तरह सत्कार किया | वाड़े में तात्या साहेब नूलकर अपने परिवार के साथ ,बापूसाहेब जोग और बाबा साहेब सहस्त्र बुद्धे हैं | पहुँचने के तुरंत बाद हम सभी साईं महाराज के दर्शन के लिए गए | वे मस्जिद में थे | प्रणाम करने के बाद मैनें और मेरे पुत्र ने अपने साथ लाए हुए फल और उनके आग्रह पर कुछ रूपये भेंट किए | साईं साहेब तब बोले कि पिछले दो बरस से ज्यादा समय से वो ठीक नहीं रहे , और ये भी कि, वो केवल ज्वार की रोटी और थोड़ा पानी लेते रहे | उन्हों ने अपने पाँव पर एक छोटा सा घाव दिखलाते हुए कहा कि उसमे कोई कीड़ा पद जाया , उसे निकाल तो दिया लेकिन निकालने में से वह बीच में टूट गया , और फिर से पनप गया , वगैरह वगैरह |वे बोले कि उन्होंने सुना है कि जब तक वे उस जगह वापस नहीं जाएँगे जहाँ से वे आए थे तब तक उनके लिए ठीक नहीं रहेगा | उनहोंने इस बात कि अपने ध्यान में रखा तो है लेकिन उन्हें अपने जीवन से अधिक अपने लोगों की फिक्र है | वे बोले कि लोगों ने उन्हें परेशान कर रखा है इसीलिए उन्हें कोई आराम नहीं मिलता | इस बारे में कुछ नहीं किया जा सकता | उसके बाद उन्होंने हमें जाने के लिए कहा और हमने वैसा ही किया | शाम के समय वे वाड़ें के पास से निकले , हम गए और उन्हें प्रणाम किया | मैं और माधवराव देशपांडे एक साथ थे | जब हमनें प्रणाम किया उसके बाद वे बोले - " वाड़े में जाओ और चुपचाप बैठो |" इसीलिए मैं और माधवराव लौट आए | हम सब बातचीत करने बैठे | उनके पास बतलाने के लिए बहुत से चमत्कार हैं |

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जय साईं राम!!!
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« Reply #1 on: January 29, 2010, 09:32:42 AM »
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ॐ साईं राम!!!

६ दिसम्बर ,१९१०~~~

सुबह मैंने सैर की और स्नान के बाद हमने साईं महाराज को जाते हुए देखा | उन्हें सर के ऊपर एक बड़ी कड़ाईदार छतरी तानी हुई थी | बाद में हम मस्जिद गए |साईं बाबा कुछ उत्साहित से दिखाई पड़े | फिर वो उठे , वहाँ एकत्रित भोजन को बाँटा और उदी देने के बाद हमसे जाने का अनुरोध किया | हमने वैसे ही किया | दोपहर का भोजन करीब ढाई बड़े तक नहीं परोसा गया | इसके बाद हम बात चीत करने बैठे | शाम को जब वे सैर पर निकले तब हमने साईं महाराज के दर्शन किए | बाद में हम चावड़ी गए , साईं महाराज आज रात वहाँ सोते है | उनके साथ राजसी छत्र , चांदी के डंडे , चँवर और पंखे आदि थे | वह स्थान बहुत अच्छी तरह से प्रकाशमय था | राधा कृष्णा नाम की महिला दीप लेका बाहर आईं | मैंने उन्हें दूर से देखा | माधवराव देशपांडे ने बताया की वे कल बाहर जाएँगे और परसों लौटेंगे | उन्होंने साईं महाराज से जाने की आज्ञा माँगी जो उन्हें मिल गई |

जय साईं राम!!! 
« Last Edit: January 29, 2010, 09:33:12 AM by Tana » Logged


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« Reply #2 on: January 29, 2010, 01:35:20 PM »
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७ दिसम्बर , १९१०~~~

सुबह मेरे प्रार्थना करने के बाद श्री बालासाहेब भाते , जो एक निव्रत्त मामलेदार हैं , वाड़े में आए और हमसे बातचीत करने बैठे | वे यहाँ पिछले कुछ समय से रह रहे हैं और उनके चेहरे प् एक अदभुत शान्ति है | हमने साईं महाराज के बाहर जाते हुए दर्शन किए और दोपहर में उनके पास मस्जिद गए | मैं , बाबासाहेब सहस्त्रबुद्धे , मेरा पुत्र बाबा , बापूसाहेब जोग और उनके सब बच्चे इक्कठे गए और वहाँ बैठे | साईं माराज बड़े ही विनोदी भाव में दिखाई पड़ रहे थे | उन्होंने बाबासाहेब सहस्त्रबुद्धे से पूछा कि क्या वे बंबई से आए हैं |बाबासाहेब सहस्त्रबुद्धे ने इसका उत्तर "हाँ " में दिया  | बाबासाहेब सहस्त्रबुद्धे से फिर पूछा गया कि , क्या वे बंबई वापस जाएँगे | उन्होंने फिर से इस बात का उत्तर ' हाँ ' में दिया , लेकिन ये भी कहा कि वे वहाँ रहने के बारे में निश्चित नहीं है क्यों कि यह परिस्थितियों पर निर्भर करे गा | साईं महाराज इस पर बोले - ' हाँ , कि ये सच है कि तुम्हारे हाथ में बहुत सारे काम हैं , अभी और भी करने हैं | तुम्हें यहाँ करीब चार- पाँच दिन रहना चाहिए | तुम यहीं रहोगे , यह तुम खुद देख लेना | जो अनुभव होते हैं वे सच हैं | वे काल्पनिक नहीं हैं | मैं यहाँ हज़ारों साल पहले था |' फिर साईं महाज मेरी ओर मुड़े और कोइ नई बात के बारे में बोलने लगे | वे बोले - " ये दुनिया भी मजेदार है , सभी मेरी प्रजा है , मैं सबको सामान रूप से देखता हूँ , लेकिन कुछ चोर बन जाते है , और मैं उनके लिए क्या कर सकता हूँ ? जो लोग खुद मौत के नज़दीक है वे दूसरों की मौत चाहते है और उसकी तैयारी करते हैं |ऐसे लोगों ने मुझे बहुत नाराज़ किया | उन्होंने मुझे अच्छी - खासी चोट पहुँचाई , लेकिन मैंने कुछ नहीं कहाँ | मैं चुप रहा |  ईश्वर बहुत महान है उसके अधिकार सब जगह हैं वे सब से शक्तिशाली है | हर किसी को उसी स्थिति में खुश रहना चाहिए जिसमें ईश्वर उसको रखता है | लेकिन मैं बहुत सशक्त हूँ | मैं यहाँ आठ-दस हज़ार साल पहले था | '' मेरे पाथर ने उनसे कहानी सुनाने के लिए कहा जैसी उन्होंने पहले सुनाई थी | साईं महाराज ने पूछा कौनसी कहानी थी | मेरे पाथर ने जवाब दिया कि वह कहानी थीं भाईयों के बारे में थी जो एक मस्जिद में गए | उनमें से एक ने बाहर जा कर भिक्षा माँगनी चाही | बाकी भाई उसे यह करने देना नहीं चाहते थे , क्योंकि भिक्षा  में माँगा हुआ खाना अशुद्ध होता और उनका चौका दूषित कर देता | तीसरे भाई ने उत्तर दिया कि अगर वह भोजन उनका चौका खराब कर दे तो उसकी टाँगे काट देनी चाहिए , वगैरह | साईं महाराज बोले वह बहुत अच्छी कहानी थी | वे एक और सुनाएँगे जब उन्हें सुनाने का मन करेगा | मेरे बेटे ने कहा कि उसे नहीं मालूम कि ऐसा कब होगा | और अगर उनका मन हमारे जाने के बाद करे तो उसका क्या फ़ायदा ? इस पर साईं साहेब ने उससे कहा कि वह भरोसा रखे कि कहानी उसके जाने से पहले सुनाई जाएगी | मैंने उनसे पूछा कि वे कल आराज़ क्यों थे , और उन्होंने जवाब दिया कि वे नाराज़ थे क्योंकि तेली ने कुछ कहा था | तब मैंने पूछा कि आज खाना परोसने के समय वे ऐसा कहते हुए क्यों चिल्लाए - " मत मै , मत मार ", उन्हों कहा कि वे इसलिए चिल्लाए थे क्योंकि पाटिल के परिवार वाले आपस में झगड़ रहे थे | साईं साहेब ने ऐसी अनोखी मधुरता से ये बात कही और वे ऐसे असाधारण ओज के साथ के बार मुस्कुराए कि यह बातचीत मेरी स्मृति में हमेशा अंकित रहेगी | बदकिस्मती से तभी कुछ और लोग आ गए और बातचीत बीच में ही रुक गई | हमें इस बात का भुत अफसोस हुआ लेकिन कुछ हो नहीं सकता था | हम इस बारे में बात करते हुए लौट आए | तात्यासाहेब नूलकर बातचीत के पहले हिस्से में मौजूद नहीं थे , लेकिन बाद में आए | बालासाहेब भाटे शाम को आए और हम सब फिर बात करने बैठे |

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« Reply #3 on: January 30, 2010, 06:45:51 PM »
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८ दिसम्बर १९१०~~~

सुबह के वक्त , पूजा के बाद हमने साईं साहेब के और दिनों की तरह दर्शन किये , जब वे बाहर जा रहे थे | बाद में हम दोपहर में उनको देखने गए लिकिन हमें लौटना पड़ा क्योंकि वे अपने पैर धो रहे थे | बाबासाहेब सहस्त्रबुद्धे , मैं , मेरा पुत्र और एक कोई एनी सज्जन , जो आज सुबह ही आए थे उस दल में शामिल थे जिसे वापस लौटना पड़ा | तात्या साहेब नूलकर हमारे साथ नहीं आए थे | बाद में हम फिर से गए , लेकिन साईं साहेब ने हमें जल्दी ही वापिस कर दिया इसीलिए हम लौट आए | वे कुछ सोचने में बहुत व्यस्त दिखलाई पड़े | रात को साईं साहेव चावडी में सोए और हम शोभा यात्रा देखने गए | वह बहुत अच्छी थी | जिन सज्जन के बारे में ऊपर कहा गया था , वे एक पुलिस अफसर हैं , मेरे ख्याल से हेड कांस्टेबल | उन पर घुसखोरी का आरोप था और सेशन कोर्ट ने उन पर मुकद्दमा चलाया | उन्हेंने संकल्प किया था कि अगर वे इस मुकद्दमे में छुट जाए तो वह साईं महाराज के पास आए गे |वह छुट गए और अपना संकल्प पूरा करने आये हैं | उनको देख कर साईं महाराज बिगड़े और पुचा -- " तुम कुछ और दिनों वहाँ क्यों नहीं ठहरे ?? बेचारे लोग निराश हुए होंगे |'' उन्हेंने यह बात दो बार कहीं | बाद में हमें पता चला कि उन सज्जन के मित्रों ने उनको रुकने के लिए बहुत कहा लिकिन उन्हेंने उनके आग्रह को नहीं माना | उन्हेंने साईं साहेब को पहले नहीं देखा था | और उनके मित्रों ने निश्चय ही उन्हें कभी नहीं देखा होगा | आश्चर्य है कि साईं महाराज ने उनको जान लिया और वह सब कहा |

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« Reply #4 on: February 01, 2010, 01:30:47 PM »
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९ दिसम्बर , १९१०~~~

मैं और मेरे पुत्र ने आज जाना चाहा | सुबह पूजा के बाद हमेशा की तरह हम साईं महाराज के दर्शन को गए | उनहोंने मेरे पुत्र से पूछा कि क्या वे जाना चाहता है , और फिर बोले कि हम जा सकते है | हमने सोचा कि हमें जाने की आज्ञा मिल गयी और हम चलने की तैयारी करने लगे | मेरे पुत्र ने सारी चीज़ें बाँधीं और एक गाडी जाने के लिए और दूसरी सामन ले जाने के लिए तैयार की | दोपहर में रवाना होने से पहले हम औपचारिक रूप से हम साईं महाराज से मिलाने गए|
मुझे देखकर साईं महाराज बोले , " क्या तुम्हारा वास्तव में जाने का इरादा है ?? " मैंने उत्तर दिया - " मैं जाना चाहता हूँ लेकिन अगर आपकी आज्ञा न हो तो नहीं |" उनहोंने कहा , " तुम कल या परसों जा सकते हो | वडा तो हमारा घर है और जब मैं यहाँ हूँ तो किसी को भी डराने की ज़रूरत नहीं | यह हमारा घर है और तुम्हें भी इसे अपना ही घर समझना चाहिए|" मैं रुकने के लिए मान गया और हमने अपने रवाना होने के सारे प्रबंध रोक दिए | हम बातचीत करने के लिए बैठ गए | साईं महाराज बहुत आनन्द में थे और उनहोंने बहुत सारी अच्छी बातें कहीं लेकिन शायद मैं उन्हें समझ नहीं पाया|

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« Reply #5 on: February 01, 2010, 02:14:25 PM »
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jaisairam

Dadasaheb Khaparde visited Shirdi in all five times during Sai Baba's lifetime.
Shirdi Diary of the Hon'ble Mr Ganesh Shrikrishna Khaparde brings out briefly the full impact of Shri Sai Baba's presence,-his cryptic remarks, his teachings through parables, and above all, his intense love for humanity. The very atmosphere of those days is recreated for us in these pages.

In one of the entries of Sri Khaparde's Shirdi diary dated 17/1/1917 he writes "we went to the Chavdi for Kakad Aarti. Megha was too ill to attend. So Bapu Sahib did the Aarti.  According to khaparde  Baba was very soft spoken. When he used to be in good mood he used to sit chatting and laughing. He used to make jokes, Sai devotees are aware of Baba making jokes at the cost of devotees. In Sai Sat Charita chapter 24 Sri Dabholkar writes that all people generally like wit and humor, but they do not like that jokes should be cut at their expense.
 But Baba's method was peculiar. It was very interesting and instructive, and the people, therefore did not mind if they’re held up to the ridicule. After that he narrates the Chanakya Lila story. He narrates that Baba through his jokes advices us that before the senses, mind intellect enjoy their objects, He should be first remembered and if this be done, it is a way of making an offering to Him. This will help in removing the attachment for them. In the same chapter there is a story of another witty incident involving Anna Chinchanikar and Mausi Bai.
 In this incident also Baba asks as to what harm or impropriety is there, when a mother is kissed by a child. ProbablHe was not really angry of course and did the whole thing as a Lila"y He put forward that for the spiritual up-liftment of all women are to be seen as mothers.

His mood used to change occasionally showing shades of anger.But every time this anger proved to be for the benefit of one or the other devotee.
But every time this anger proved to be for the benefit of one or the other devotee. Sri Khaparde records slight change in his mood in one of the entries dated 11th December 1910.Some time it was very difficult to interpret or understand Baba's behaviour.

 On 26th of December Mr Khaparde writes "I got up early and attended Kakad Arti. Sai Maharaj was in rather unusual[ mood, took his stick and with it tapped the ground round about. By the time he descended the steps of Chawdi He walked twice backward and forward and used violent language.”
On 14th of February 1912 it is mentioned in Khaparde’s diary "I got up early, attended the Kakad Arti and was very much struck by the fact that Sai Baba on leaving the Chawadi made passes with short stick towards the east, north and south. Then he proceeded with hard words as usual.” On 3rd January 1912 Sri Khaparde has entered in his diary "He was in a very pleased mood and laughed and abused in one and the same breath.”


















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« Reply #6 on: February 03, 2010, 08:02:11 PM »
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१० दिसम्बर , १९१०~~~

सुबह की प्रार्थना के बाद मैंने अपने पुत्र से बाबा से हमारे जाने के बारे में साईं महाराज को कभी भी कुछ न बोलने के लिए कहा | वे सब जानते है , और हमें कब भेजना है वे जानें | रोज की तरह हमने साईं साहेब को देखा जब वे बाहर जा रहे थे , और बाद में हम लोग मस्जिद गए , साईं साहेब बहुत ही आनन्दित थे और उनहोंने एक बालिका के पूर्वजन्म की कहानी सुनाई जो उनके साथ खेल रही थी | उनहोंने कहा कि वह एक कलाकार थी और मर गई और साधारण रूप से दफना दी गई | साईं साहेब उस रास्ते से गुजरे और उसकी कब्र के पास एक रात ठहरे | फिर वह उनके साथ चली उन्हींने उसे एक बाबुल के पेड़ में रखा और फिर उसे यहाँ ले आए | उनहोंने कहा पहले वे कबीर थे और सूत कातते थे | बातचीत अत्यंत सुखद थी | दोपहर में वर्धा के श्रीधर परांजपे अपने साथ श्री पंडित , एक अन्य चिकित्सक और एक तीसरे सज्जन को लेकर आए | अहमदनगर के कनिष्ट अधिकारी श्री पटवर्धन भी उनके साथ थे | मेरा पुत्र और वे कालेज के पुराने सहपाठी हैं | वि सभी साईं साहेब के दर्शन को गए और हम सब उनके साथ थे | साईं साहेब ने उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जैसा वे हर किसी के साथ करते हैं | औ पहले तेली मारवाड़ी वगैरह के बारे में बोले | फिर वे इमारतों के बारे में बोले जो बनवाई जा रही हैं | और कहने लगे , '' दुनिया पागल हो गई हैं | हर आदमी ने बुरे सोच का एक अजीब रुख़ अपना लिया हैं मैंने कभी भी अपने आप को उनमें से किसी की बराबरी में नहीं रखा |इसीलिए वे क्या कहते है मैं कभी नहीं सुनता | और न ही जवाब देता हूँ | मैं क्या जवाब दूँ ? '' उसके बाद उनहोंने उडी वितरित ही और हमें बाड़े में लौट जाने को कहा | उनहोंने पटवर्धन कनिष्ट को संकेत किया और रोज़ की तरह 'कल' को रवानगी का दिन बतलाते हुए उसे रुकने के लिए कहा | मैं और बाबासाहेब सहस्त्रबुद्धे वाडे लौट आए | ऐसा लगता है कि परांजपे और उनके साथी राधा कृष्णा के पास गए | बापूसाहेब जोग की पत्नी बीमार चल रही है | उसे साईं साहेब जो कुछ कहते है उससे बहुत लाभ पहुंचा है , और उसे वे कोइ दवा नहीं देते | लिकिन ऐसा मालूम पड़ रहा है कि आज उसका धैर्य ख़त्म हो गया और उसने चले जाना चाहा | यहाँ तक कि बापूसाहेब जोग भी लाचार होकर उसको जाने देने के लिए मान गए | साईं साहेब ने उसके स्वास्थ के बारे में और वे कब जा रही हैं , कई बार ऐसी पूछताछ की | लेकिन शाम को बापूसाहेब जोग ने औपचारिक रूप से साईं साहेब से आज्ञा लेने की बात कही तो वह बोली कि अब वह पहले से ठीक महसूस कर रही है और अब नहीं जाना चाहती है -- हमें हैरानी हुई |

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« Reply #7 on: February 05, 2010, 01:38:57 PM »
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११ दिसम्बर १९१०~~~

सुबह प्रार्थना के बाद मैनें हाथ मुँह धोया ,बंबई के श्री हरिभाऊ दीक्षित और उनके कुछ अन्य साथी स्वर्गीय डाँ-आत्माराम पांडुरंग के पुत्र श्री तर्खड , और श्री महाजनी , जो अकोला के अण्णा साहेब महाजनी के चचेरे भाई हैं , के साथ रोज़ की तरह साईं साहेब के पास गए | आज की बातचीत महत्वपूर्ण थी और दो घटनाओं के कारण उल्लेखनीय थी,साईं महाराज ने कहा कि वे एक कोने में बैठा करते थे और उन्होंने अपने शरीर का निचला हिस्सा एक तोते से बदलना चाहा | ये अदला बदली हुई और उन्हें इस बात का अहसास नहीं हुआ | और एक साल में उन्होंने एक लाख रूपये गवा दिए | फिर उन्होंने एक खम्बे के पास बैठना शुरू किया  और तब एक विशाल सर्प जागा ,और वह भुत क्रोधित था | वह ऊपर की ओर उछलता था और ऊपर से नीचे की ओर भी गिरता था | फिर उन्होंने इस विषय को बदल दिया और कहा कि वे एक जगह गए और वहां का पाटिल उन्हें तब तक जाने नहीं देता जब तक वे एक बागीचा न लगाएँ और उसमे से होता हुआ पैदल चलने के लिए एक पक्का मार्ग बनाएँ | वो बोले कि उन्होंने दोनों काम पूरे किए | उसी समय कुछ लोग वहां आए | उस आदमी से वे बोले , " मेरे सिवाय तुम्हारी देखभाल करने वाला कोइ नहीं है | " फिर चारों ओर देखते हुए उन्होंने कहा कि , वह उनकी संबंधी है और रोहिला से ब्याही हुई है जो आदमियों को लुटते हैं | फिर वे कहने लगे , दुनिया खराब है लोग अब वैसे नहीं जैसे वे पहले होते थे | पहले वे शुद्ध आचरण वाले और विश्वसनीय होते थे | अब लोग एक दुसरे का विश्वास न करने वाले और किसी भी बात का गलत पक्ष समझने वाले हो गए है , और उसके बाद उन्होंने कुछ और भी कहाँ जो मैं समझ नहीं पाया| ये उनके पिटा , दादा और फिर उनके पिटा और दादा बनाने के बारे में था | अब घटनाओं के बारे में ऐसा है , श्री दीक्षित फल कै, साईं साहेब ने कुछ खाए और बाकी और लोगों में बाँट दिए | बाला साहेब जो एह तालुका के मामेदार रहे थे वहां थे आयर बोले कि साईंमहाराज केवल एक किस्म के ही फल दे रहे थे | मेरे पुत्र औने मित्र पटवर्धन को बतलाया कि साईं महाराज ने मेरे जिस भक्ति भाव से वे फल अर्पित किए गए थे उसी के अनुपात में उन्हें स्वीकार या अस्वीकार किया | मेरे पुत्र , बाबा ने यश बात मुझे और पटवर्धन को भी बतलाने की कोशिश की | इससे थोड़ा शोर हुआ और साईं महाराज ने मुझको ऐसी नज़रों से देखा जो अदभुत रूप से चमक रही थी और क्रोध की चिंगारी लिए हुई थी | उन्होंने मुझसे इस सवाल का जवाब माँगा कि मैंने क्या कहा था | मैंने उत्तर दिया कि मैं कुछ नहीं कह रहा था और बच्चे आपस में बात कर रहे थे | उन्होंने मेरे पुत्र और पटवर्धन की ओर देखा और फिर तुरंत ही अपना रुख बदल लिया | आखिर में बाला साहेब मिरीकर ने ऐसा कहा कि साईं महाराज सारा वक्त हरिभाऊ दीक्षित से बात कर रहे थे | दोपहर में हम लोग जब भोजन कर रहे थे श्री मिरीकर के पिताजी आए जो अहमदनगर में इनामदार और विशेष मजिस्ट्रेट हैं | वे पुराणी चाप के बहुत सम्मानीय व्यक्ति हैं | मुझे उनकी बाते बहुत पसंद आई | शाम के समय हमने रोज़ की तरह साईं साहेब के दर्शन किए और हम रात क बात करने बैठे , और श्री नूलकर के पुत्र विस्वनाथ ने भजन किए जैसे वह हर रोज़ करता है|

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« Reply #8 on: February 05, 2010, 02:09:30 PM »
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१२ दिसम्बर , १९१०~~~

सुबह की प्रार्थना के बाद हमने साईं महाराज को हमने रोज़ाना की तरह निकलते हुए देखा और हर रोज़ की तरह आपस में बात करने बैठे | श्री दीक्षित ऐसा मालूम पड़ता है कि पुरी तरह से बदल गए हैं | और बहुत सारा समय उपासना में लगाते हैं और उनका स्वभाव हमेशा से ही नरम था , उसमें भी एक विचित्र मिठास आ गयी है जो पुरी तरह से उनके अंतर्मन की शान्ति के कारण है |इसके तुरंत बाद रावबहादुर राजाराम पन्त दीक्षित पुलगाँव से आए | उन्होंने बताया कि जब वे नागपुर से चले उनका शिरडी आने का कोइ विचार नहीं था , लेकिन पुलगाँव में अचानक ही उनका आने का इरादा बन गया ,और दरअसल उनकी यात्रा का निश्चय उन्होंने क्षण भर में ही कर लिया | मुझे उनको देखकर बहुत खुशी हुई | बाद में हम सब साईं साहेब के दर्शन को गए | मुझे थोड़ी देर हो गई और में उन्हें द्वारा बताई गई एक बहुत रोचक कहानी नहीं सुन पाया | वे किस्से -कहानियों से सीख देते है | यह एक ऐसे आदमी के बारे में थी जिसके पास एक सुन्दर घोड़ा था , वह कुछ भी करे लेकिन घोड़ा उसकी एक भी नहीं सुनता था | उसे सभी जगह ले गए और सब सामान्य प्रशिक्षण दिया गया लेकिन कोइ लाभ नहीं हुआ | आखिरकार , एक विद्वान ने सुझाव दिया कि उसे उसी जगह ले जाया जाए जहां से वह मूलरूप से लाया गया था | ऐसा की किया गया और उसके बाद से वह ठीक हो गया और बहुत उपयोगी हुआ | मैंने इस किस्से का केवल एक अंश ही सूना | फिर उन्होंने पुचा कि में कब जा रहा हूँ | मैंने कहा कि में तब जाऊँगा जब वे अपने आप मुझे जाने की आज्ञा दें | उन्होंने कहा , 'तुम आज भोजन करने के बाद जाओ ' और बाद में माधव राव देशपांडे के हाथों मेरे लिए प्रसाद के रूप में दही भेजा | मैंने उसे भोजन में लिया और उसके बाद तुरंत साईं साहेब के दर्शन पाने गया | जैसे ही में वहां पहुचाँ उन्होंने जाने के लिए अपनी आज्ञा को फिर से पक्का किया | मेरा पुत्र इस आज्ञा के आरे में निश्चित नहीं था इसलिए उसने फिर से खुल कर पुचा , और आज्ञा स्पष्ट शब्दों में दे दी गई | आज साईं महाराज ने दूसरों से दक्षिणा माँगी लेकिन मुझसे और मेरे पुत्र से कुछ नहीं लिया | मेरे पास पैसा बहुत कम था और ऐसा लगा कि उनको ये मालूम था | श्री नूलकर , श्री दीक्षित , श्री बापूसाहेब जोग , बाबासाहेब सहस्त्रबुद्धे , माधव राव देशपांडे , बालासाहेब भाटे , वासुदेव राव और अन्य को विदा करने के बाद हम पटवर्धन , प्रधान , काका महाजनी , श्री तर्खड और श्री भिंडे , जो आज ही आए थे , के साथ रवाना हुए | हमने लगभग ६.३० बजे कोपरगाँव में ट्रेन पकड़ी और मनमाड तक का सफर किया , श्री भिंडे येवला में उतर गए | में और मेरा पुत्र जल्दी ही मनमाड से पंजाब मेल से निकलेगे|

 jyot jyot jyot jyot jyot jyot jyot jyot jyot

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« Reply #9 on: February 09, 2010, 01:16:47 PM »
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शिरडी में दूसरा लंबा वास्तव्य ~~~

६ दिसम्बर , १९११~~~


जैसे ही मेरा तांगा श्री दीक्षित द्वारा नवनिर्मित वाडे के पास पहुँचा पहले व्यक्ति जिनसे मेरी भेंट हुई वे थे श्री माधवराव देशपांडे | मेरे टाँगे से उतरने से पहले ही श्री दीक्षित ने आज रात मुझे आज रात अपने साथ भोजन करने के लिए कहा | उसके बाद मैं माधव राव के साथ साईं महाराज के प्रति अभिवादन करने के लिए गया और थोड़ी दूर से उन्हें प्रणाम किया | उस समय वे हाथ -पैर धो रहे थे | फिर मैं नहाने-धोने और पूजा करने में व्यस्त हो गया  और वे जब बाहर निकले तब उन्हें प्रणाम नहीं कर सका |  बाद में हम लोग एक साथ उनके पास गए और मस्जिद में एक साथ उनके पास गए और मस्जिद में उनके पास बैठे | उन्होंने एक ऐसे फकीर की कहानी सुनाई जिसे अच्छे पकवानों का शौक था | इस फकीर को एक बार किसी रात्रि भोज पर आमंत्रित किया गया और वे साईं महाराज के साथ गए | निकलते समय फकीर की पत्नी ने साईं महाराज को उस भोज से कुछ खाना लाने के लिए कहा और इसके लिए एक बर्तन दिया | फकीर ने इतना जम कर खाया कि फिर उसी जगह पर सो जाने का फैसला किया | साईं महाराज रोटियाँ अपनी पीठ पर बाँधकर और रसदार भोज्य पदार्थ वाले बर्तन को अपने सर पर उठाए वापिस निकले | उन्हें रास्ता बहुत ही लंबा लगा | वे रास्ता भूल गए | कुछ देर आराम करने के लिए एक मांग वाड़े के पास बैठ गए | कुत्ते भौकने लगे, वे उठे और अपने गाँव लौट आए और रोटी व् भोज्य पदार्थ फकीर की पत्नी को दे दिया | तब तक फकीर भी लौट आए और उन सब ने एक साथ बहुत अच्छा भोजन किया | उन्होंने आगे कहा कि एक अच्छे फकीर का मिलना बहुत कठिन है |श्री साथे जिन्होंने वह वाड़ा बनवाया जिसमें मैं पिछले साल रहा था , भी आए हुए है , और मैंने उन्हें पहले मस्जिद में देखा और फिर रात्रि भोज पर | श्री दीक्षित ने बहुत सारे लोगों को भोजन कराया | उनमें श्री ठोसर भी हैं , जो सवर्गीय माधव राव गोविन्द रानाडे की बहिन के पुत्र हैं | ठोसर बंबई के कस्टम कार्यालय में नौकरी करते है | वे बहुत भले आदमी हैं और हम बात करने बैठे | वहां पर एक सज्जन नासिक से हैं और एनी कई लोग हैं | उनमें से एक टिपणीस सपत्नी आए हैं | और वे अपनी पत्नी को पुत्र-प्राप्ति की याचना के लिए लाए हैं| बापूसाहेब जोग यहाँ हैं, और उनकी पत्नी की तबीयत ठीक हैं | श्री नूलकर अब जीवित नहीं हैं और मैं उन्हें बहुत याद करता हूँ | उनके परिवार का यहाँ कोइ नहीं हैं | बाला साहेब भाटे यहाँ हैं और उनकी पत्नी ने दत्त जयन्ती के दिन एक पुत्र को जन्म दिया | हम लोग दीक्षित वाड़े में ठहरे हैं जो बहुत सुविधाजनक है |

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« Reply #10 on: February 10, 2010, 05:58:42 PM »
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७ दिसम्बर , १९११ ~~~

मैं कल अच्छी नींद सोया | मेरे पुत्र और पत्नी का भीष्म के साथ मन लग रहा था | विष्णु भी यहाँ हैं | हमने आज बहुत सारे लोगों को भोजन कराया , और मैं इस जगह की नियमित दिनचर्या में आ गया हूँ | मैंने बाबा साईं महाराज को जब वे बाहर जा रहे थे , नमन किया | और उनके मस्जिद में लौटने के बाद , और फिर से शाम को , बाद में फिर से जब वे सोने के लिए चावडी में गए तब दर्शन किए | भजन-पूजन कुछ कम था | हमारे शेज आरती से लौटने के बाद , भीष्म ने और दिन की तरह भजन किए और श्री ठोसर ने कुछ पद गाए , कुछ उनकी अपनी रचनाएं थी और बाकी कबीर , दासगणु और अन्य की | दासगणु की पत्नी बया , जो पिछले साल यही थी , अब उनके पिता के घर है | हम लोग देर रात तक बात करने बैठे | रात को माधव राव देशपान्डे ने हनन बताया की दादा केलकर का बाबू नाम का एक भतीजा था |साईं महाराज उसके प्रति बहुत दयालु थे | वह बाबू मर गया और महाराज आज तक उसे याद करते हैं | श्री मोरेश्वर विश्वनाथ प्रधान जो की बंबई में एक व्यवसायी वाकी है , साईं महाराज के दर्शन करने आए | उनकी पत्नी को देख कर साईं महाज ने कहाँ कि वह बाबू की माँ हैं | बाद में वह गर्भवती हुई , और बंबई में उसके प्रसव के दें यहाँ साईं महाराज ने कहा कि उन्हें पीड़ा हुई , और यह भी कि जुडवाँ बच्चे होंगे और उनमें से एक मर जाएगा | ऐसा ही हुआ और श्रीमती प्रधान अपने छोटे पुत्र को लेकर यहाँ आई तो साईं महाराज ने उसे अपनी गोद में लिया और पूछा कि ,  क्या वह एस जगह आएगा , और दो महीने के उस बच्चे ने बहुत साफ जवाब  दिया  "" हूँ "" |

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« Reply #11 on: February 11, 2010, 07:47:50 PM »
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८ दिसम्बर , १९११~~~

मैं कल और परसों कहना भूल गया कि उपासनी वैद्य , जो अमरावती में थी , यहाँ हैं और मेरे यहाँ पहुँचने के तुरंत बाद मिलें |हम लोग बातचीत करने बैठे | उन्होंने मुझे अमरावती छोड़ने के बाद से अपनी कहानी संक्षेप में बतलाई कि किस तरह वे ग्वालियर स्टेट गए , किस तरह उन्होंने एक गाँव खरीदा उससे कोइ आमदनी नहीं हुई |कैसे उनकी एक महात्मा से भेंट हुई , कैसे वे बीमार पद गए , कैसे उन्होंने सभी इकाज आज़माए , कितने ही साधू और महात्माओं के पास गा , आखिर में किस तरह साईं महाराज ने किस तरह अपने हाथों में लिया , कैसे उनमें सुधार हुआ और अब यहाँ रहने की आज्ञा का पालन कर रहे हैं |
उन्होंने संस्कृत में साईं महाराज के एक स्तोत्र की रचना की है | हम सब जल्दी उठ गए और कांकड़ आरती में में सम्मिलित होने के लिए गए | यह बहुत ही सुखकर है | मैंने प्रार्थना की , स्नान किया और साईं महाराज के बाहर जाते हुए दर्शन किए | और फिर उनके लौटने के बाद , और एक बार फिर दोपहर में | साईं महाराज मेरी और देखते हुए बोले " क्यों सरकार ! " फिर उन्होंने सामान्य उपदेश दिया कि मुझे वैसे ही रहना चाहिए जैसे ईश्वर मुझको रखे , और फिर कहा कि जो आदमी अपने परिवार से जुड़ा है उसे बहुत कुछ सहन करना पड़ता है वगैरह वगैरह , और फिर एक अमीर व्यक्ति की कहानी बतलाई जो शाम तक भूखा रहा , अपने लिए भोजन बनाया और एक मोटी रोटी खाई , इन सबके पीछे कारण कोइ अस्थाई परेशानी थी | हमने शाम को साईं महाराज के फिर दर्शन किए और दीक्षित द्वारा बनवाई वाडे के बरामदे में बैठे | बंबई के दो सज्जन एक सितार लाए और उसे बजाने लगे , भजन किए | श्री ठोसर , जिन्हें मैं हज़रात कहता हूँ , ने भी बहुत सुन्दर गायन किया और भीष्म ने एनी दिनों की तरह भजन किए | आधी रात तक समय बहुत आनन्द से बीत गया | श्री ठोसर बहुत ही अच्छे साथी हैं | मैंने अपने पुत्र बलवंत , बंबई के सज्जन और अन्य लोगों के साथ चिंतन मनन आदि के बारे में लम्बी वार्ता की |

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« Reply #12 on: February 13, 2010, 01:49:07 PM »
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९ दिसम्बर , १९११ ~~~

मुझे उठने में और प्रार्थना करने में थोड़ी देर हो गई | आज श्री चांदोरकर एक नौकर के साथ आए | अन्य भी आए और कुछ लोग जो यहाँ थे चले गए | श्री चांदोरकर सरल और बहुत भले आदमी हैं , बातचीत में बहुत मधुर और अपने व्यवहार में सुलझे हुए | मैं मस्जिद में गया और देर तक वहां कही जाने वाली बातों को सुनता रहा | साईं महाराज आनन्द भाव में थे | मैं अपना हुक्का वही ले गया और साईं महाराज ने उसमें से काश लिया | आरती के समय वे अनोखे रूप में सुन्दर दिखे , लेकिन उसके तुरंत बाद बा ही उन्होंने सब को वापिस भेज दिया | उन्होंने कहा की वे हमारे साथ रात्रि भोज के लिए आएँगे | वे मेरी पत्नी की " आजीबाई " कहते हैं | हमारे ठिकाने पर लौटने पर हमें पता चला कि श्री दीक्षित की पुत्री , जो बीमार थी ,  वो चल बसी | कुछ दिनों पहले मृतक को स्वप्न आया कि साईं महाराज ने उसे नीम के पेड़ के नीचे रखा था | साईं महाराज ने भी कल कहा था कि उस बालिका की मृत्यु हो गई है | हम लोग उस दुखद घटना के बारे में बात के बारे में बात करने बैठे |वह बच्ची केवल सात वर्ष की थी | मैं गया और उसके पार्थिव अवशेषों को देखा | वे बहुत मनमोहक लगे, उसके चहरे पर मृत्यु के बाद जो भाव था वः अनोखे रूप से मधुर था | इससे मुझे मडोना के उस चित्र की स्मृति हो आई जिसे मैंने इंग्लैड में देखा था | डाह संस्कार हमारे वाड़े के पीछे हुआ |

मैं शव यात्रा में शामिल हुआ और चार बजे शाम तक नाश्ता नहीं किया | दीक्षित ने यह धक्का खूब अच्छी तरह झेला | उनकी पत्नी स्वाभाविक रूप से दुःख के मारे टूट गई | हर किसी ने उनके साथ सहानुभूति की | शाम को सूर्यास्त और शेज आरती दोनों समय मैं साईं महाराज को देखने चावडी गया | रात को मैं , माधव राव देशपांडे , भीष्म और बाकी लोग देर तक साईं महाराज के बारे में बात करने बैठे | ठोसर को साईं महाराज से बंबई लौटने की आज्ञा मिल गई | वे कल सुबह जाएंगे |

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« Last Edit: February 13, 2010, 02:15:34 PM by Tana » Logged


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« Reply #13 on: February 15, 2010, 02:46:07 PM »
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१० दिसम्बर , १९११ ~~~

सुबह मेरे प्रार्थना ख़त्म करने से पहले बंबई के सोलिसिटर दत्तात्रेय चिटणीस आए | जब मैं मैं कालेज में पढाता था तब वे वहाँ नए-नए आए थे | इसलिए वे बहुत पुराने मित्र हैं | स्वभाविक ही है कि वे पुरानें दिनों की बाते करने बैठ गए |  हमेशा की तरह मैंने साईं महाराज के दर्शन किए जब वे बाहर गए , और बाद मैं फिर जब वे बाहर से लौटे और अपनी जगह पर बैठे |हम सब आरती के बाद वापस लौटे | नाश्ता कुछ देर में हुआ और उसके बाद मैं उपासनी से , फिर बाद में श्री नानासाहेब चांदोरकर के साथ बातचीत करने को बैठा | वे साईं महाराज के अगर मुख्य नहीं तो सबसे पुराने शिष्य है | वे बहुत ही जिंदादिल आदमी हैं , उन्होंने अपनी आपबीती मुझे बतलाई कि किस तरह वे साईं महाराज के संपर्क में आए और आत्मोन्नति की | वे मुझे उन निर्देशों को बतलाना चाहते थे जो उन्हें मिले थे लेकिन लोग इकट्ठा हो गए और वः बात सब के सामने बतलाई नहीं जा सही | मैंने दो बार दोपहर में साईं महाराज को देखने की कोशिश की वे किसी से भी मिलने के इच्छुक नहीं थे | मैंने शाम को चावड़ी पास उनके दर्शन किए और साठे साहेब , चितणीस और अन्य लोगों के साथ लम्बी बातचीत की | नरसोंबावाड़ी से कोइ एक गोखले आया | वह कहता कि उसे केड्गांव के नारायण महाराज और साईं महाराज के दर्शन का निर्देश मिला है | वह बहुत अच्छा गाता है | और रात को मैंने उससे कुछ भजन गवाए | श्री नाना साहेब चांदोरकर आज थाने लौटे हैं | बाला साहेब भाटे ,जिनका कुछ दिन पहले जो पुत्र हुआ था वह आज शाम को चल बसा | यह बहुत दुखद था | साईं महाराज ने आज दोपहर को कोइ औषधि बनाई जो उन्हेंने ली |

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« Reply #14 on: February 15, 2010, 03:20:11 PM »
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११ दिसम्बर , १९११ ~~~

आज सुबह प्रार्थना बहुत बहुत आनन्ददायक थी| और उसके बाद मैंने अपने को बहुत प्रफुल्लित अनुभव किया | उसके बाद मैं दत्तात्रेय चिटणीस को पंचदशी को प्रारम्भ के कुछ पद समझाने को बैठा | वह बहुत भला आदमी है | उसके बाद हम साईं महाराज के पास गए , दोनों समय जब वे बाहर गए और जब वे लौटे | उन्होंने मुझे कई बार चिलम दी और अंगूर दिए जो राधा कृष्णा माई ने भिजवाए थे | उन्होंने दो बार मेरे पुत्र बलबंत को अंगूर दिए | दोपहर में मैंने सूना कि वे मस्जिद की सफाई कर रहे थे | इसीलिए मैंने उस तरफ जाने का प्रयास नहीं किया | सभी लोग साईं महाराज के पास प्लेग से छुटकारा पाने के लिए एक शिष्ट मंडल लेकर आए | उन्होंने लोगों को सड़के साफ करने के लिए , कब्रों तथा जलाने व दफ़नाने के घाटों की सफाई करने और गरीबों को अन्नदान करने का आदेश दिया | मैंने पूरी दोपहर दैनिक अखबार पड़ने और चिटणीस तथा अन्य लोगों से बाते करने में बिताई | उपासनी कुछ रचना कर रहे हैं | शाम को हमने साईं महाराज के चावड़ी के पास दर्शन किए और फर शेज आरती में सम्मिलित हुए जिसके बाद चिटणीस , उनके इंजिनियर मित्र और एक अन्य व्यक्ति चले गए |

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« Reply #15 on: February 17, 2010, 07:12:43 PM »
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१२ दिसम्बर , १९११ ~~~

मैं और भीष्म यह सोचकर जल्दी उठ बैठे , कि काकड़ आरती शुरू होने वाली है लेकिन हम लोग करीब एक घंटा आगे थे | बाद में मेघा आया और हम आरती में शामिल हुए | फिर मैंने प्रार्थना की और साईं महाराज के बाहर जाने की प्रतीक्षा में बैठ गया |मैंने उनके तब दर्शन किए और वापस लौटने के बाद भी | मैंने इसके बीच का समय गोखले के गीत सुनने में बिता या | वह अच्छा गाता था | आज नाश्ता देर से हुआ क्योकि मेधा को बेल पत्र नहीं मिल सके और उसे उनके लिए बहुत दूर जाना पड़ा | इसलिए दोपहर की पूजा करीब डेड़ बजे तक समाप्त नहीं हुई | साईं महाराज बहुत प्रसन्न भाव में थे और बैठे हुए बातचीत करते और हँसते रहे | नास्ते के बाद मैं कुछ देर लेट गया और फिर अपने लोगों के साथ मस्जिद गया | साईं महाराज आनन्द भाव में थे और उन्होंने एक कहानी सुनाई | पास पड़े हुए एक फल को उठा कर उन्होंने मुझसे पूछा कि , यह कितने फल पैदा कर सकता है | मैंने उत्तर दिया कि , उतने हज़ारों बार जितने बीज इसके अन्दर है | वे बड़ी मधुरता से मुसुराएं और आगे बोले कि , ये तो अपने ही नियम का पालन करता है | उन्होंने यह भी बताया कि , किस तरह वहां एक बहुत भली और शुद्ध आचरण वाली लडकी थी , किस तरह उसने उनकी सेवा की और उन्नति की | हमें लगभग सूर्यास्त के समय ' उदी ' मिली और साईं महाराज के दर्शन के लिए , जब वे शाम की सैर के लिए बाहर निकलते है , हम चावड़ी के सामने खड़े हो गए | हमने उनके दर्शन किए और वापस आकर भीष्म गोखले , भाई और एक नवयुवक दीक्षित के भजन सुनाने बैठ गए |
माधव राव देशपांडे और उपासनी उपस्थित थे | शाम बहुत सुखद बीती |

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« Reply #16 on: February 17, 2010, 07:25:55 PM »
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१३ दिसम्बर , १९११ ~~~

मैं सामान्य दिनों की तरह उठा , प्रार्थना की और स्नान करना चाहा लेकिन गर्म पानी तैयार नहीं था , इसीलिए बाहर निकला और बात करने बैठ गया | मैंने साईं महाराज को जब वे बाहर जा रहे थे , नमन किया और फिर स्नान किया | मैंने पंचदशी का पाठ किया | बाद में मैं मस्जिद में साईं महाज के दर्शन के लिए गया और आरती के बाद वापस आ गया | लगभग चार बजे मैं , बलवंत , भीष्म और बंडू के साथ गया जो मेरा हुक्का लेकर आया था , और साईं महाराज ने उसमें से कश लिया | माधव राव ने मेरे अमरावती लौटने के लिए आज्ञा माँगी लेकिन साईं महाराज बोले कि वे एस बारे में कल सुबह निश्चित करेगे | उन्होंने वहा उपस्थित सभी लोगों को मस्जिद के बाहर कर दिया और अत्यधिक स्नेह से , शुद्ध पितृभाव में मुझे निर्देश दिए | सूर्यास्त पर हम फिर से गए और चावड़ी के सामने उनके दर्शन किए | और शेज आरती में शामिल हुए | फिर भीष्म ने और दिनों से जल्दी ही पंचपदी की | भाई ने भी एक भजन गाया |


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« Reply #17 on: February 22, 2010, 09:55:10 AM »
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१४ दिसम्बर , १९११  ~~~

रवाना होने की इच्छा से मैं जल्दी उठ गया | काकड़ आरती में शामिल हुआ , और कुछ जल्दी से पूजा करके माधवराव देशपांडे के साथ मस्जिद में साईं महाराज के पास गया | साईं महाराज ने कहा कि मैं कल जा सकता हूँ | और आगे बोले कि मुझे केवल प्रभु की ही सेवा करनी चाहिए और किसी की नहीं | उन्होंने कहा - " जो भगवान् देते हैं वह कभी ख़त्म नहीं होता और जो आदनी देता है वह कभी रहता नहीं '' | फिर मैं वापस आ गया और कल्याण के दरवेश साहेब फाल्के को आते देखा | वे पुराने किस्म के बड़े भले व्यक्ति हैं | श्री शिंगणे और उनकी पत्नी उनके साथ हैं | श्री शिंगणे बंबई के ऊँचे दर्जे के वकील हैं | और वकालत की शिक्षा भी देते हैं | मैं मध्यान्ह पूजा में सम्मलित हुआ और मैंने बापूसाहेब जोग के साथ नाश्ता किया | उसके बाद मैं लेता उअर मुझे नींद आ गई | मुझे मस्जिद जाने में थोड़ी देर हो गई और बाद मैं मैंने चावडी के पास नमस्कार किया | उसके बाद मैं दरवेश साहेब और श्री शिंगणे के साथ बातचीत करने बैठा | बाद में भीष्म णे अपना दैनिक भजन का कार्यक्रम सम्पन्न किया |

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« Reply #18 on: February 22, 2010, 10:20:06 AM »
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१५  दिसम्बर , १९११  ~~~

सुबह प्रार्थना के बाद मैं श्री शिंगणे और दरवेश साहेब फाल्के के साथ बातचीत करने बैठा | वे हाजी साहेब भी कहलाते हैं | उन्होंने बग़दाद , कान्सटेंटीनोपोल और मक्का , और आसपास के स्थानों की यात्रा की है | उनकी बातचीत बहुत ही सुखकर और उप्देश्कारी है | साईं महाराज उन्हें बहुत पसंद करते हैं , उनके लिए भोजन भिजवाते हैं और उनका बहुत ख्याल रखते हैं | मैंने साईं महाराज के , बाहर जाते हुए और बाद मैं फिर उनके मस्जिद लौटने पर , दर्शन किए | वे बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में थे और हम सब णे उनकी बातों का आनन्द लिया | खाने के बाद मैं थोड़ी देर के लिए लेटा और फिर मेरे पुत्र बलवंत के द्वारा पड़े गए दिल्ली के एक विवरण को सुनने बैठ गया | फिर हम लोग मस्जिद गए , साईं महाराज के आशीष प्राप्त किए और बाद में शेज आरती के लिए गए |

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« Reply #19 on: February 23, 2010, 06:55:38 PM »
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१६ दिसम्बर , १९११ ~~~

पता चला कि मुझे ज़बर्दस्त सर्दी लग गई है | मैं काकड़ आरती के लिए समय पर नहीं उठ सका | मैं सुबह तीन बजे उठा और फिर देर तक सोता रहा | प्रार्थना के बाद मैं दरवेश साहेब फाल्के के साथ बातचीत करने बैठ गया , जिन्हें लोग बिना सोचे - विचारे हाजी साहेब या हज़रत कहते हैं | वे हिन्दू परम्परा के अनुसार एक कर्मयोगी कहे जा सकते हैं | और उनके पास सुनाने के लिए अनेकों किस्से - कहानियाँ हैं | मैंने साईं महाराज के बाहर जाते हुए और बाद में जब वे मस्जिद लौट रहे थे तब दर्शन किए | वे अत्यंत आनन्द भाव में थे , और बातें व हंसी मज़ाक करने बैठे | आरती के बाद मैं अपने ठिकाने पर लौटा , खाना खाया और थोड़ी देर के लिए लेट गया लेकिन सो नहीं पाया | अमरावती से उन्होंने मुझे अमृत बाजार पत्रिका के अलावा बंबई एडवोकेट के दो अंक भी भेजे , इसलिए पड़ने के लिए काफी सामग्री है | सेशन केस के प्रस्ताव के बारे में एक तार भी मिला | तीन दिन पहले वर्धा में एक केस की पेशकश के बारे में एक तार था | मैंने अस्वीकार कर दिया क्योंकि साईं महाराज ने लौटने की अनुमति नहीं दी | आज के तार के बारे मैं भी वही नतीज़ा हुआ | माधव राव देशपांडे ने मेरे लिए अनुमति माँगी , और साईं महाराज ने कहा कि मैं परसों या अब से एक महीने बाद जा सकता हूँ | इससे मामा तय हो गया हैं | मैंने उन्हें सामान्य दिनों की तरह चावडी के सामने नमन किया और आरती के बाद हम वाड़े में भीष्म के भजन सुनने बैठे | आज नए आने वालों में से श्री हाटे हैं जिन्होंने एल.एक.एण्ड.एस. की परीक्षा दी है | वे बहुत ही भले नवयुवक हैं | उनके पिता जी अमरेली में जज थे और बाद में पलिताना के दीवान बने , मेरे विचार से मैं उनके चाचा को जानता हूँ |

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