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Sai-Ka-Aangan - Shirdi Sai Baba Forum
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OM SAI RAM. This is an open Forum for sharing your experiences and SAI LEELAS with the whole world. We request all the Sai Devotees to join hands and spread the light of SRI SAI BABA all over the world. JAI SAI RAM

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Contributor Topic: मेरा जी चाहता है साईं  (Read 4860 times)
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saisewika
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« Reply #80 on: December 22, 2009, 02:37:19 AM »
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ॐ साईं राम

एक दिवस हेमाड जी
पहुँचे द्वारकामाई
लीला की तैयारी करके
बैठे थे प्रभु साईं

कपडा एक बिछाकर प्रभु ने
चक्की रक्खी उस पर
गेहूँ डाला, लगे पीसने
आटा साईं गुरूवर

बाबा की लीला लखने को
उमडी जनता सारी
कोई समझ सका ना लीला
बाबा जी की न्यारी

चार स्त्रियाँ आगे बढकर
पहुँची साईं के पास
जबरन चक्की ले लेने का
करने लगी प्रयास

पहले क्रोधित हुए, शाँत फिर
हो गए बाबा साईं
पीछे हटकर बाबा ने थी
चक्की उन्हें थमाई

चक्की पीसते, रही सोचती
चारों ही ये बात
इस आटे की उनको ही
बाबा देंगे सौगात

घर द्वार नहीं है बाबा का
ना वो रसोई बनाते
पाँच घरों से माँग के भिक्षा
बाबा काम चलाते

यही सोचते, गाकर गीत
सारा गेहूँ पीसा
आपस में बाँट के आटा
चली ले अपना हिस्सा

उनको देख ले जाते आटा
क्रुद्ध हो गए साईं
एक गरजती वाणी फिर थी
उनको पडी सुनाई

किसकी सँपत्ति समझ कर तुम
ले जाती हो आटा
कर्ज़दार का माल नहीं जो
आपस में है बाँटा

जाओ, इस आटे को
गाँव की सीमा पर ले जाओ
सारे आटे की इक रेखा
सीमा पर बिखराओ

हुए अचँभित शिरडी वासी
आदेश साईं का पा कर
आटा बिखराया शिरडी की
सीमा पर ले जा कर

चहूँ ओर प्लेग था फैला
छाई थी महामारी
सरक्षित शिरडी को करने की
थी उनकी तैयारी

भक्तों ने साईं लीला का
पाया मधुर सुयोग
रही सदा सुरक्षित शिरडी
फैला ना कोई रोग

हुए रोमाँचित हेमाड जी
देख साईं की लीला
भक्ति रस से हो गया
उनका तन मन गीला

उपजा पावन हृदय में
अति उत्तम सुविचार
साईं की गाथा लिखी तो
होगा बेडा पार

भक्तों का कल्याण करेंगी
बाबा की लीलाएँ
सुने गुनेगा जो कोई उसके
पाप नष्ट हो जाएँ

शामा जी ने करी प्रार्थना
बाबा जी के आगे
मिली स्वीकृति गाथा लिखने की
भाग्य हेमाड के जागे

ऐसे लीला रच बाबा ने
दाभोलकर को चेताया
माध्यम उन्हें बना कर अपना
अमृत रस बरसाया

मुदित हुए सब भक्त जो पाया
सच्चरित्र का दान
श्रद्धा प्रेम की लहर उठी तो
मिटा घोर अज्ञान

जय साईं राम

« Last Edit: December 22, 2009, 02:48:08 AM by saisewika » Logged
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« Reply #81 on: December 24, 2009, 01:58:07 AM »
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ॐ साईं राम

शुक्रिया साईं नाथ तेरा
करूँ मैं बारम्बार
नाम सुनाम भेंट दिया
करने को उद्धार

बुद्धिहीन मैं अति मलिन
तुम सच्ची सरकार
लेकर अपनी शरण में
ढाँपे सभी विकार

मन मेरा था कीच भरा
कमल तुम्हारा नाम
खिला जो चँचल चित्त में
सजा तुम्हारा धाम

जीवन के पथरीले पथ पर
थामी मेरी बाँह
जब जब भूली रास्ता
करी प्रकाशित राह

दिया सहारा भक्ति का
डोलूँ ना चहुँ ओर
डगमग जब विश्वास हुआ तो
खींची मेरी डोर

कभी परखने मन मेरा
फेंका माया जाल
चेतन करके फिर मुझे
खुद ही लिया निकाल

भक्तों की सत्सँगत का
चखवाया सुस्वाद
तेरा लीला गान सुना तो
छूटे सभी विषाद

धन्य धन्य मैं हो गई
पा कर तुम सा नाथ
मुझ सम अधमा को प्रभु
जोडा अपने साथ

धन्यवाद कैसे करूँ
अनगिन तव उपकार
सीमित मेरी लेखनी
लघुतम मैं लाचार

भाव भरा इक नमन ही
दे सकती जगदीश
श्रद्धामय वँदन मेरा
स्वीकारो हे ईश

जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #82 on: December 29, 2009, 07:16:58 AM »
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ॐ साईं राम

साईं तेरी प्यारी आँखें
सब दुनिया से न्यारी आँखें

झील से भी गहरी आँखें
भक्त जनों की प्रहरी आँखें

करूणा रस छलकाती आँखें
प्रेम गंग बरसाती आँखें

ममता भरी भरी सी आँखें
सुन्दर और चमकीली आँखें

दुख से बोझिल होती आँखें
भक्तों के सँग रोती आँखें

प्रेम पगी मुस्काती आँखें
अँदर तक धँस जाती आँखें

चुप रह कर भी बोलें आँखें
अमृत रस सा घोलें आँखें

देखें सबको हर पल आँखें
गँगा जल सी निर्मल आँखें

जय साईं राम
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||बाबा मेरे जादूगर-उनके केवल दो ही मंत्र||


« Reply #83 on: December 30, 2009, 04:09:26 PM »
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 flower flower flower flower flower
sai teri nirmal आँखें ~
sai teri kuch kehtiआँखें ~
Sai teri dekhti आँखें~
sai teri sunti आँखें~
sai teri shaant आँखें~
sai teri satavana deti आँखें~
sai teri dua karti आँखें ~
Sai teri paalan karti आँखें~
sai teri poshan karti आँखें ~
sai teri jagmagaati आँखें ~
sai teri sheetal आँखें ~

sai teri aankhon mein basi main ~sai tu bhi bas jaa aankhon mein meri~

sai teri आँखें  ~
sai teri आँखें  ~
sai teri आँखें  ~


 flower flower flower flower flower
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||श्रद्धा है साईनाथ~सबुरी से मिले साईनाथ||


« Reply #84 on: December 30, 2009, 04:34:47 PM »
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 flower flower flower flower flower flower flower flower

Nigah e karam teri  आँखें ~
rehem nazar teri  आँखें ~
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« Reply #85 on: December 31, 2009, 11:38:44 PM »
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ॐ साईं राम

नव वर्ष की प्रथम बधाई
तुम्हें हो साईं नाथ
द्वितीय मेरे मात पिता को
जिनका आशिष साथ

फिर बाबा के भक्त जनों को
नव वर्ष की बधाई
सब भक्तों के अंग संग सोहे
साईं सर्व सहाई

अति सुखद हो मंगलमय हो
नया चढा जो साल
संतति विहीनों के आंगन में
खेले बाल गोपाल

कोई भी दुखिया ना होवे
ना होवे लाचार
आधि व्याधि दूर हटाएं
साईं सर्वाधार

पूरण हों सबकी आशाएं
खुशियां हो बेअंत
शुभ कर्मों की वृद्धि हो
पापों का होवे अंत

श्रद्धा और सबूरी का
मनों में हो प्रकाश
भक्ती भाव भरपूर रहे
और पूरा हो विश्वास

दुनिया के सब मुल्कों में
शांति हो समृद्धि हो
आतंकवाद का नाश हो
भाईचारे की वृद्धि हो

हाथ जोड कर तुमसे विनती
करते हम सरकार
हर प्राणी के हृदय में
भर दो करुणा प्यार

जय साईं राम 
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« Reply #86 on: January 03, 2010, 02:19:23 AM »
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ॐ साईं राम
 
साईं के दरबार में
शुभ आगमन नव वर्ष का
भक्त जनों के सन्मुख आए
समय सदैव हर्ष का
 
हरेक मानव के हृदय में
साईं नाम व्याप हो
सत्कार्य की वृत्ति हो
मुख में साईं जाप हो
 
हर्ष हो उल्लास हो
साईं मिलन की आस हो
श्रद्धा का दामन ना छूटे
मन में दृढ विश्वास हो
 
कोई भूखा सोए ना
दुखी ना हो कोई आत्मा
साईं भक्त हर जन में देखें
अँश इक परमात्मा

रोग ना हो, शोक ना हो
तन मन सभी के स्वस्थ हों
कार्य शील बनें सभी
साईं कारज में व्यस्त हों

साईं ने कहा है जैसा
प्रेम करें हर प्राणी से
साईं की आज्ञा को मानें
मन, कर्म और वाणी से
 
साईं की महिमा कहें
साईं की लीला सुने
साईं सच्चरित्र के सभी
साईं वचनों को गुनें

जो दिया है साईं ने
खुशी उसी में मान लें
साईं की रज़ा में ही हम
रज़ा अपनी जान लें
 
मन में चिर सँतोष हो
खुश रहें हर हाल में
धन्यवाद आओ करें
साईं का नए साल में
 
नूतन वर्ष पर करें
नव सँकल्प धारण सभी
नहीं करेंगे साईं से
गिले और शिकवे कभी
 
साईं की शिक्षाओं को
हृदय में हम धार लें
नया चढा जो साल उसे
साईं पर ही वार दें
 
जय साईं राम
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« Reply #87 on: January 06, 2010, 04:13:06 AM »
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ॐ साईं राम

रे मन साईं नाम जप
पल पल आठों याम
लगन लगी जो नाम की
तो होगा तव कल्याण

ऐसे साईं सिमरिए
ज्यों नवेली नार
सिमरे प्रियतम प्यारे को
भूल के सब संसार

जैसे गढे खजाने में
रहे कृपण का ध्यान
धर के ऐसे ध्यान तू
सिमर साईं भगवान

ज्यों भूखा सिमरे सदा
भोजन और पकवान
सुरत लगा कर ऐसे ही
सिमरों साईं नाम

पाने को जल बूँद ज्यों
चातक सिमरे मेघ
ऐसे मन में राखिए
साईं नाम का वेग

दूर देश के पुत्र को
जैसे ध्याती माता
मनसा, वाचा, कर्मणा
सिमरो साईं विधाता

चलता चल संसार में
पकड नाम की डोर
लक्ष्य बना ले एक ही
शुभ चरणों की ठौर

जय साईं राम
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« Reply #88 on: January 06, 2010, 09:55:34 AM »
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ॐ सांई राम!!!

रे मन साईं नाम जप
पल पल आठों याम
लगन लगी जो नाम की
तो होगा तव कल्याण~~~

चलता चल संसार में
पकड नाम की डोर
लक्ष्य बना ले एक ही
शुभ चरणों की ठौर~~~


बस इसी तरह,
धीरे धीरे कदम बढ़ाते बढ़ाते,
मैं यूँ ही होती गई बाबा के करीब,
पता न चला कि कब थामी बाबा ने बाह,
कब रखा सिर पर अपना हाथ,
कब बना सांई मेरा सहारा,
कुछ न पता चला,
बस~
बाबा तुम्हारी तरफ बढ़ते हर कदम पर यही महसूस किया,
कि मैं खुद से ही दूर होती चली गई~~

सुरेखा दी फिर से आप का शुक्रियां और नमन....  angelic

जय सांई राम!!!
« Last Edit: January 06, 2010, 09:56:39 AM by Tana » Logged


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« Reply #89 on: February 05, 2010, 10:31:15 PM »
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ॐ साईं राम

कोई साज़ नहीं है हाथ मेरे
महिमा तेरी गाऊँ कैसे
कागा जैसे स्वर में बाबा
तुमको गीत सुनाऊँ कैसे

ना मैं मीरा, ना मैं राधा
ना मैं मुक्ताबाई,
ना मैं शौनक, ना मैं नरहरि,
ना मैं सजन कसाई

प्रहलाद के जैसा तप ना जानूँ
ना ध्यानूँ सा ध्यान
नारद जैसा जप ना जानूँ
नहीं जनक सा ज्ञान

नहीं लेखनी मेरे हाथ में
हेमाडपंत के जैसी
जैसी दासगणु की थी
नहीं मेरी वाणी वैसी

मैं बस तेरी सेविका
अति मलिन, गुणहीन
तुम हो स्वामी परब्रह्म
मैं विरहिन अतिदीन

पूजन अर्चन मनन के
नियम नहीं मैं जानूँ
भाव भरी प्रीति करूँ
लक्ष्य तुम्हीं को मानूँ

तेरी प्रेम उपासना
करूँ पडी दिन रैन
तेरे दर्शन को तरसें
मेरे चँचल नैन

तेरी कमली बनके मैं
घूमूँ जग के बीच
मन के चक्षु खोल कर
तन की आँखें मीच

तुझे रिझाने को साईं
बस इतना कर सकती
तेरा नाम ले कर जिऊँ
तेरा नाम ले मर सकती

जय साईं राम
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« Reply #90 on: February 09, 2010, 12:14:01 AM »
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ॐ साईं राम

दासगणु जी महाभक्त थे
भक्तों के भक्तार
साईं की महिमा पहुँचाई
हर घर में हर द्वार

गणपत्त राव दत्तात्रेय
ये असली था नाम
कार्यरत थे पुलिस बल में
रक्षा का था काम

नानासाहेब चाँदोरकर के सँग
शिरडी धाम को आते थे
बाबा जी का प्रेम और आशिष
दोनो ही वो पाते थे

नाच और गाना प्रिय था उनको
पुलिस की नौकरी के साथ
गाँव जिले की नौटँकी में
खुश हो कर लेते थे भाग

परख लिया था बाबाजी ने
गणपतराव की क्षमता को
लेकिन गणपत्त समझ ना पाए
साईं नाथ की ममता को

बाबा जी चाहते थे, गणु जी
छोड दें अब पुलिस का काम
प्रभु को जीवन अर्पण करके
पाँवें श्री चरणों मे स्थान

परम देव ने लीला रच कर
उनको खींचा अपनी ओर
आशिष पा कर बाबा जी का
'दासगणु' जी हुए विभोर

त्यागपत्र दे दिया उन्होंने
छोड दिया था पुलिस का काम
साईं नाम का कीर्तन करते
घूमें गणु जी ग्राम ग्राम

अलख जगाई साईं नाम की
बहुत किया गुण गान
शब्दों के मोती चुन चुन कर
रचना करी महान

एक दिवस निश्चय किया
दासगणु ने आप
प्रयाग स्नान कर पाएँ तो
होंगे वो निष्पाप

देवा की आज्ञा लेने वो
पहुँचे द्वारका माई
बाबा जी की मधुर सी वाणी
उनको पडी सुनाई

इधर उधर क्यूँ व्यर्थ भटकते
मुझ पर करो विश्वास
प्रयाग काशी सारे तीरथ
पाओगे मेरे पास

दासगणु ने साईं चरणों में
श्रद्धा से शीश नवाया
गँगा जमना की धारा को
श्री चरणों में बहता पाया

भक्ति भाव से रोमाँचित हो
रोए 'गणु' बेहाल
"साईं स्त्रोतस्विनी" उनके मुख से
प्रवाहित हुई तत्काल

साईं नाम की ध्वजा को
पकड कर अपने हाथ
भवसागर से पार गए
भजते 'गणु' साईं नाथ

जय साईं राम
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« Reply #91 on: February 13, 2010, 05:15:49 AM »
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ओम साईं राम

शिवरात्रि के अगले दिन
झील के किनारे टहलने गई
तो बाबा को पहले से ही वहां बैठा पाया
आंखे मली, चुटकी काटी
खुद को ही यकीं ना आया

करीब गई, ध्यान से देखा
हां मेरे प्यारे साईं ही थे
मेरे राम, मेरे देव
मेरे कृष्ण कन्हाई ही थे

दण्डवत प्रणाम किया
पर बाबा ने ना ध्यान दिया
फिर रूखे स्वर में बाबा बोले
वैसे तो तुम साईं नाम का दम भरती हो
पर जो मुझे रूचते नहीं
वो काम क्यूं करती हो?

हाथ जोडकर मैंने पूछा
मुझसे क्या कुछ भूल हो गई?
मेरी कैसी करनी आपकी
शिक्षा के प्रतिकूल हो गई?

बाबा बोले गलती करके भी
तुम्हें उसका अहसास नहीं
यकीन जानो अभी तुम्हें
साईं नाम का अभ्यास नहीं

कल तुम शिव पूजन के लिए
मन्दिर गई थीं
याद करो तुमने एक नहीं
गलतियां करी कई थीं

मन्दिर के बाहर एक भूखा बालक
मां का हाथ थामें रोता था
एक और मां के आंचल में
भूखा ही सोता था

तुम उन्हें देख कर भी
आगे बढ गई
दूध की थैली लिए
तुम मन्दिर की सीढियां चढ गई

शिवलिंग पर तुमने
पंचामृत और दूध चढाया
और सोचा अपने कर्मों के खाते में
एक और पुण्य बढाया

अगर तुम उन भूखे बच्चों को
दूध पिलाती
और शिवलिंग पर
भक्ती भाव का तिलक ही लगाती

तो भी भोले बाबा
उसे स्वीकार करते
तुम्हारे दिल में दया है
इसलिए तुम्हें प्यार करते

पर तुम निर्दयी ही नहीं
क्रूर भी थी
खुद को बडा भक्त समझने के
अहंकार में चूर ही थीं

इसीलिए तुम लाईन तोड
गलत तरीके से आगे बढी
एक वृद्धा को धक्का मारा
और उसके पैर पर चढी

दर्द से वो कराही
पर तुमने ना ध्यान दिया
कई भक्तों को पीछे छोडा
इस जीत पर भी अभिमान किया

तुम क्या सोचती हो
तुम्हारी पूजा स्वीकार होगी
पूजा का आडम्बर करके
तुम भवसागर से पार होगी

तुम्हे लगता है
भक्ती मर्ग पर चलना बहुत आसान है
नहीं, इस पर चलना
पतली सुतली पर चलने के समान है

पग पग पर
गड्डे हैं,खंदक है, खाई है
ज़रा सी भूल
और पतन की गहराई है

मुझ तक पहुंचने के लिए
बीच का कोई रास्ता नहीं
या तो तुम्हारा इस माया से
या मुझसे कोई वास्ता नहीं

इसलिए या तो तुम
मेरे नाम का दम मत भरो
या फिर पूरे मन से ही
मुझे याद करो

तुम्हे बार बार समझाने
तुम्हारे पास आता हूं
क्यूंकि अपना नाम लेने वालों को
मैं बहुत चाहता हूं

संभलो, जीवन को यूं ना
बेकार करो
दुखियों का दर्द समझो
प्राणीमात्र से प्यार करो

अगर तुम ये सीधा सच्चा
रास्ता अपनाओगी
नि: संदेह अपने बाबा को
एक दिन अपने सन्मुख पाओगी

जय साईं राम
 
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« Reply #92 on: February 13, 2010, 07:51:19 AM »
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वाह वाह..क्या बात है साईं सेविका जी ,

संभलो, जीवन को यूं ना
बेकार करो
दुखियों का दर्द समझो
प्राणीमात्र से प्यार करो

अगर तुम ये सीधा सच्चा
रास्ता अपनाओगी
नि: संदेह अपने बाबा को
एक दिन अपने सन्मुख पाओगी



हर बार यही कहता हूँ  कि
असीम कृपा है आप पर सरस्वती माँ की और बहुत प्रीत है बाबा साईं को आप से और आप को बाबा साईं से.

और यही चाहता हूँ कि सदा ये कृपा बनी रहे और हमें अमृत रस पान मिलता रहे.

जय श्री सांई राम  jyot


« Last Edit: February 13, 2010, 07:52:35 AM by Gopal Krishan » Logged

सब का मालिक एक--सांईराम
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« Reply #93 on: February 15, 2010, 09:54:53 PM »
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ॐ साईं राम

कल वैलन्टाइन डे पर
बाबा की मूरत के आगे
सिर झुकाया
तो बाबा जी को
मँद मँद मुस्कुराते हुए पाया

बाबा ने अपने
सुन्दरतम लब खोले
और प्रेम से होले होले
ये बोले
 
"लगता है आज फिर
प्रेम दिवस आया है
इसीलिए तुमने
लाल गुलाब का फूल
चढाया है"
 
मैनें कहा बाबा आपने
बिल्कुल ठीक पहचाना है
असल में मुझे आपको
अपना वैलन्टाइन बनाना है
 
क्या आप मेरा
वैलन्टाइन बनोगे?
और मेरी झोली
ढेर सारे प्रेम से भरोगे?

बाबा ने कुछ सोचा
और मुस्कुरा कर कहा
असल में मेरे दिल में भी है
किसी का वैलन्टाइन बनने की चाह

पर क्या तुम वो लाई हो
जो सब अपने वैलन्टाइन को देते हैं
और बदले में उनका
ढेर सा प्रेम पा लेते हैं?

वो मँहगे चाकलेट,
दिल की आकृति के गुब्बारे
गुलदस्ते और कार्ड
और गिफ्ट्स ढेर सारे

मैनें कहा- नहीं बाबा
मैं ये सब तो नहीं लाई हूँ
आपको अपना वैलन्टाइन बनाने
मैं खाली हाथ ही आई हूँ

पर मेरे दिल में
श्रद्धा और सबूरी है और प्रेम का भाव है
और सच बताऊँ मुझे हर दिन
आप को अपना वैलन्टाइन बनाने का चाव है

ये कहते हुए मेरा कँठ रूँध गया
आँखों में आसूँ भर आए
बाबा के चरणों में मैने
आँसुओं के फूल चढाए

बाबा बडे प्रेम से बोले
पगली-----
मुझे इसी प्रेम भाव की ही
दरकार है
मैं अपने सब भक्तों का
वैलन्टाइन हूँ
मुझे अपने सब प्रेमी भक्तों से
बेपनाह प्यार है

जय साईं राम
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« Reply #94 on: February 19, 2010, 01:46:31 AM »
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ॐ साईं राम

राधाकृष्णा माई जी
परम भक्त थी बाबा की
शिरडी ही उनकी काशी थी
शिरडी ही उनका काबा थी

२५ वर्ष की आयु में वो
शिरडी धाम पधारी थी
भक्ति भाव अटूट था उनमें
पर किस्मत की मारी थी

सुन्दरा बाई नाम था असली
दुनिया का कुछ ज्ञान ना था
अति रुपवान थी वो पर
रँग रूप का मान ना था

सतरह वर्ष की आयु में ही
विवाह हो गया था उनका
लेकिन उनके भाग्य में
प्रणय बँध का सुख ना था

आठ दिवस पश्चात विवाह के
विधवा हो गई नार नवेली
दुख का सागर उमडा उन पर
दुनिया में रह गई अकेली

मोह भँग हो गया था उनका
चैन कहीं ना पाती थी
परम ईश को लगी ढूँढने
शहर शहर वो जाती थी

यूँ हीं ढूढती सदगुरू अपना
पहुँची थी वो शिरडी धाम
साईं नाथ का दरस जो पाया
आहत रूह को मिला आराम

अँतरयामी बाबा जी ने
हाल सभी था जान लिया
"राधामाई" कह कर पुकारा
और 'शाला' में स्थान दिया

अगले दस बरस तक भक्तिन
भूली अपना नाम ग्राम
केवल साईं नाथ की सेवा
बस ये ही था उनका काम

जिन जिन रस्तों से बाबा जी
गुज़रा करते थे दिन में
'माई' उनको झाड बुहार
स्वच्छ करती थी पल छिन्न में

चावडी में सोने की जब
बाबा की बारी होती थी
राधा माई उस दिन जतन से
द्वारकामाई को धोती थी

राधामाई की प्रेरणा से ही
गठित हुआ था साईं सँस्थान
धीरे धीरे दस दिश गूँजा
शिरडी धाम का पावन नाम

साईं सँस्थान की हर इक वस्तु
राधामाई ने सँजोयी थी
साईं की सेवा में "राधा"
मीरा बन कर खोई थी

निःस्वार्थ यूँ सेवा करती
राधाकृष्णा माई जी
अँतरँग भक्तिन कहलाई
साईं सर्व सहाई की

दस वर्ष पश्चात अचानक
उन्नीस सौ सोलह में वो
परम ईश को प्रिय हो गई
परम नींद में गई वो सो

निष्काम भक्ति का प्रतीक बना
राधाकृष्णा माई का जीवन
अर्पण करके साईं नाथ को
पाया अमोलक साईं नाम धन

जय साईं राम

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« Reply #95 on: February 19, 2010, 08:37:08 AM »
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हर बार एक ही बात , हर लिखी हुई रचना आप की मुझे बाबा साईं के बारे में और ज्ञान देती है . मुझे और करीब ले जाती है बाबा साईं के .

धन्यवाद शायद छोटा अक्षर होगा साईं सेविका माई आपके लिए.

जय श्री सांई राम  jyot


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« Reply #96 on: February 21, 2010, 03:22:40 AM »
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ॐ साईं राम

साईं राम गोपाल कृष्ण जी

क्या कहूँ
बस यही सच है कि---

अति मलिन हूँ, लघुतम हूँ
नख शिख भरा विकार
भक्ति पथ के नियम ना जानूँ
ना जानूँ व्यवहार

शब्दों का कुछ हेर फेर बस
इतना ही हो पाता
इससे ज़्यादा बाबा मुझको
और नहीं कुछ आता

वो भी तब, जब बाबा जी की
कृपा दृष्टि होती है
वरना कहीं कोने में दुबकी
कविता पडी सोती है

पात्र नहीं सम्मान की ऐसे
जानूँ स्व औकात
परम भक्तों की पग धूलि मैं
परम सत्य ये बात

जय साईं राम
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« Reply #97 on: February 22, 2010, 09:15:58 AM »
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Quote:
Sent by saisewika on February 21, 2010, 03:22:40 AM
ॐ साईं राम

साईं राम गोपाल कृष्ण जी

क्या कहूँ
बस यही सच है कि---

अति मलिन हूँ, लघुतम हूँ
नख शिख भरा विकार
भक्ति पथ के नियम ना जानूँ
ना जानूँ व्यवहार

शब्दों का कुछ हेर फेर बस
इतना ही हो पाता
इससे ज़्यादा बाबा मुझको
और नहीं कुछ आता

वो भी तब, जब बाबा जी की
कृपा दृष्टि होती है
वरना कहीं कोने में दुबकी
कविता पडी सोती है

पात्र नहीं सम्मान की ऐसे
जानूँ स्व औकात
परम भक्तों की पग धूलि मैं
परम सत्य ये बात

जय साईं राम



यही सच है तो इस सच का स्वरूप भी सभी सच की तरह मीठा और आनन्द देने वाला है.

बाबा साईं की कृपा से आज हम सब आपकी कविता के आनन्द में भाव-विभोर है.
बाबा साईं ने बहुत की सुन्दर कला से नवाज़ा है आपको.
बस यही कामना है, इसी तरह अपनी सुन्दर और बाबा के करीब ले जाने वाली रचनाओं का सदा हम सब को पान कराती रहिए .

धन्यवाद.  angelic

जय श्री सांई राम  jyot

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« Reply #98 on: February 23, 2010, 03:10:31 AM »
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ॐ साईं राम

तुझसे अब ये दूरियाँ
मुझसे सही ना जाती
मोहिनी माया जगत की
पग पग पर भरमाती

माया साँपिन बन चढी
जकडा सकल शरीर
सुख पाने की चाह में
भटकी बनी अधीर

जग के जँतर मँतर में
भूली अपनी राह
कितने विषम विकार ओढे
ईर्ष्या, द्वेष और ढाह

विषय सुखों से मोहित हो
छिटकी तुझसे दूर
आशा,तृष्णा मान में
मैं तो हो गई चूर

राग रँग में मस्त हुई
समय गँवाया व्यर्थ
श्रद्धा, भक्ति, प्रेम के
समझ ना पाई अर्थ

मेरे 'मैं" ने ढाँप लिया
परम ईश का ज्ञान
तेरा रूप ओझल हुआ
बिसरी तेरा नाम

धीरे धीरे सुख सारे
बने गले की फाँस
जग के नाते रिश्तों से
पाया कटुतम त्रास

मोहभँग सब हो गया
गई आत्मा चेत
मन उचटा सँसार से
जैसे उड जाए रेत

पश्चाताप के आँसू से
भरे मेरे दो नैन
तुझे ढूँढने निकली मैं
पाऊँ कहीं ना चैन

पत्ता गिर कर डाल से
सूखे और मुरझाए
ऐसे तुझसे बिछड कर
भक्त नहीं जी पाए

क्षमा करो हे नाथ जी
मेरे पाप के कर्म
तुझसे बिछड, वियोग का
जाना मैनें मर्म

तू तो परम दयालु है
क्षमाशील करतार
प्रेम पगी सुदृष्टि से
अब तो मुझको तार

मानुष जीवन बीत रहा
बन कर दिन और साल
महा मृत्यु के आने से
पहले मुझे सँभाल

निज भक्ति का दान दे
माँगूँ ना कुछ और
तुझसे निकटता पाऊँ मैं
श्री चरणों की ठौर

जय साईं राम
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« Reply #99 on: February 26, 2010, 06:21:43 AM »
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ॐ साईॅ राम

मेघा नामक गुजराती ब्राह्मण
विरम गाँव का रहने वाला
निर्धन और निरक्षर था पर
शिव भक्त था भोला भाला

साठे जी के घर रहता था
रसोईया था बडा गुणवान
गायत्री मँत्र तक बोल ना पाता
पर भक्ति की था वो खान

पहली बार उन्नीस सौ नौ में
शिरडी धाम में आया था
लेकिन तब बाबा का आशिष
उसको मिल ना पाया था

सुना था उसने रस्ते में कि
साईं नाथ जी हैं यवन
भोला ब्राह्मण कर ना पाया
भक्ति भाव से उन्हें नमन

मेघा के दिल की दुविधा को
बाबा ने जाना तत्काल
क्रोधित हो गए साईं, उस को
द्वारकामाई से दिया निकाल

दुखी हृदय से मेघा पहुँचा
नासिक के त्रयम्बकेश्वर धाम
डेढ वर्ष तक रहा वहाँ पर
शिव का भजता रहता नाम

अगले वर्ष उन्नीस सौ दस में
मेघा शिरडी वापस आया
दादा केलकर के आग्रह पर
बाबा ने उसको अपनाया

लगा मानने बाबा को वो
भोले शँकर का अवतार
सेवा करने को साईं की
हर दम रहता वो तैय्यार

शिरडी के सब देवालयों में
वो सुबह सवेरे जाता था
फिर साईं की पूजा करके
फूला नहीं समाता था

एक बार सक्राँति के दिन
अभिषेक कराने बाबा को
गोदावरी का जल लाने को
आठ कोस तक चला था वो

भोले भक्त के भाव जान कर
बाबा ने भी आग्रह माना
पटिया पर बैठा बाबा को
करने लगा अभिषेक दिवाना

बाबा बोले सुन लो मेघा
जल तुम मुझ पर ऐसे डालो
शरीर ना गीला होने पाए
थोडा अपना हाथ सँभालो

लेकिन मेघा भाव विह्वल था
हर हर गँगे कह कर वो
गागर पूरी उडेल साईं पर
भक्ति रस में गया वो खो

फिर गागर को एक ओर रख
देखी उसने अदभुत लीला
देह सूखी थी बाबा जी की
सिर्फ हुआ था सिर ही गीला

बाबा की सेवा में मेघा
खोया रहता था दिन रात
परम कृपालु साईं ने उस पर
किया आलौकिक 'शक्ति पात'

काँकण, मध्याह्न और शेज आरती
साईं सर्व सहाई की
तीनो मेघा ही करता था
भक्ति बनी सुखदाई थी

१५ जनवरी उन्नीस सौ बारह को
उसको थोडा ताप चढा
विघ्न पडा पूजन अर्चन में
ताप ना उतरा, और बढा

अँतरयामी साईं नाथ ने
अन्त उसका था जान लिया
अब ना मेघा बच पाएगा
देवा ने ऐलान किया

१९ जनवरी उन्नीस सौ बारह का
दिन आया बडा दुखदायी
प्रातःकाल ४ बजे मेघा ने
छोडे प्राण, परम गति पाई

उसका मृत शरीर जो देखा
फूट फूट कर रोए साईं
हाथ फेरते थे शरीर पर
रूदन करते सर्व सहाई

"सच्चा भक्त था मेरा मेघा"
ये कह कर साईं रोते थे
सगा संबंधी गया हो वैसे
धीरज अपना खोते थे

अति प्रिय होते हैं भक्त
परम पूज्य भगवान को
मानव सम रोए थे साईं
बतलाने इस ज्ञान को

धन्य धन्य थे कर्म भक्त के
साक्षात ईश्वर को पूजा
जनम सफल हुआ उसका, उस सम
बडभागी कोई और ना दूजा

जय साईं राम
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