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saisewika
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« Reply #40 on: August 02, 2009, 04:52:04 AM » |
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ओम साईं राम
आंख खुली जब आज सवेरे मन में थे कई प्रश्न घनेरे
तुमको साईं कैसे पाऊं ढूंढूं कहां कहां मैं जाऊं
यही सोच मैं घर से निकली कानों में आ बोली तितली
वो देखो वो ठीक सामने उस वृद्ध को शीघ्र थामने
जिस युवक ने बांह बढाई उसमें ही है तेरा साईं
और वो देखो दूर वहां पर मंदिर दिखता एक जहां पर
भूखों को जो रोटी देती ढेर दुआएं उनकी लेती
उस बाला में साईं को मान कर ले उसकी तू पहचान
दुखिया, पंगु और असहाय इनकी सेवा में सुख पाय
उन सब में है साईं का वास क्यूं ना तुझको है आभास
व्यर्थ भटकती यहां वहां साईंमय है सकल जहां
केवल मन की आंखे खोल मुख से साईं नाम ही बोल
मिट जायगा सब अंधियारा नित देखेगी साईं प्यारा
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #41 on: August 06, 2009, 10:45:54 PM » |
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ॐ साईं राम
इस देह में हे साईं जो सांसें आती जाती हैं संग संग में मेरे देवा बस तुझको ही ध्याती हैं
हर श्वास श्वास मेरी साईं तुझको है पुकारे तू खुद ही आ के सुन ले मेरे मीत मेरे प्यारे
हाँ मुझमें गूँजता है तेरे नाम का तराना मेरी साँसे गाती रहती हैं तेरे नाम का ही गाना
मेरे दिल की धडकनें भी हर पल है ताल देती हाथों से बजती ताली सुर लय का काम देती
जय साईं राम कह कर मैं झूम सी हूँ जाती तेरा नाम ले के देवा हर सुख मैं हूँ पाती
बन के मेरा सहारा साईं गीत बन गया है मैं गुनगुनाती रहती हूँ वो संगीत बन गया है
ये अरज है तुमसे बाबा ये लय ना मेरी टूटे चलता रहे तराना जब तक ये सांस छूटे
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #42 on: August 10, 2009, 06:40:42 PM » |
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ॐ साईं राम
साईॅ खडे हैं द्वार पे देखो हाथ पसार दो पैसे की दक्षिणा मांग रहे सरकार
पहला पैसा श्रद्धा का भक्ति भाव भरपूर लेशमात्र भी कम हो तो लेंगे नहीं हुजूर
श्रद्धा पूरी चाहिए ज्यों पूर्णिमा चन्द्र कष्ट ताप संताप से होवे ना जो मंद
पर्वत जैसा अटल रहे भक्तों का विश्वास भ्रम संशय तो हो नहीं ना होवे कोई आस
श्रद्धा से भक्ति बढे जगे प्रेम का भाव घट घट देखे साईं को चढे मिलन का चाव
दूजी दक्षिणा सबुरी की धीरज धरती जैसा साईं भक्त से मांग रहे यही दूसरा पैसा
कष्ट देखकर सामने धैर्य ना डगमग होवे सब्र करे, ना विचलित हो भक्ति भाव ना खोवे
झंझावत तूफान हो या दुख का हो सागर छलक छलक कर गिरे नहीं भक्ति रस की गागर
सब्र संपदा अति सुखद साईं की अति प्यारी जिसकी गाँठ ये संपदा साईं प्रेम अधिकारी
धृति धारणा धैर्य धर मन निर्मल हो जावे जिसके हृदय सबुरी हो वही साईं को पावे
सारे जग के दाता की भक्तों से दरकार श्रद्धा और सबुरी ही मांगे देवनहार
जय साईॅ राम
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saideep
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||श्रद्धा है साईनाथ~सबुरी से मिले साईनाथ||
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« Reply #43 on: August 10, 2009, 08:22:02 PM » |
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Baba jaise aseem hai tumhara pyaar aur grace... Aesee hi aseem rakhe hum tum per Shraddha Saburi.. Allah Malik
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saisewika
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« Reply #44 on: August 11, 2009, 07:05:35 PM » |
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ॐ साईं राम
कई बार ऐसा होता है बिलख बिलख कर दिल रोता है मैं ख़ुद पर ही झल्लाती हूँ मन मार कर रह जाती हूँ
क्यूँ ना हो पाया ये साईं तुम ही कह दो सर्वसहाई जब तुम देह में थे हे दाता क्यूँ ना जन्मी तभी विधाता
जो मैं शिर्डी वासी होती तुम्हें निरख कर हंसती रोती तव चरणों की रज मैं पाती दर्शन करते नहीं अघाती
सुप्रभात होती या रैन तक तक तुम्हें ना थकते नैन सरल साधारण सादा जीवन क्यूँ ना मिल पाया सहचर धन
सुवचन नित्त सुनती तव मुख से जीवन कट जाता अति सुख से सुभक्तों की संगत पाकर धन्य धन्य हो जाती चाकर
मैं भी तुमको चंवर ढुलाती अपनी किस्मत पर इतराती पश्चाताप बड़ा है भारी क्यूँ अब जन्मी साईं मुरारी
काश मैं यंत्र ऐसा कोई पाऊँ समय चक्र को पुन: घुमाऊं आ पहुंचू मैं तेरे द्वारे साक्षात दर्शन हों न्यारे
हाथ थाम लूँ साईं तेरा जनम सफल हो जाए मेरा
जय साईं राम
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sudha
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Sai Sudha
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« Reply #45 on: August 12, 2009, 10:26:59 PM » |
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OM SAI RAM SAISEWIKAJI
BAHUT SUNDER . MAN BHAR AYA AISI SUNDER KAVITA PAR KAR. SAI HAMESHA TUMHARI LEKHNI KO OR SUNDER SUNDER SABDON SE NAWAJEN. MERE SAI APNI ES SEVIKA PAR KRIPA KARTE RAHNA
SAISUDHA
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saisewika
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« Reply #46 on: August 12, 2009, 11:36:19 PM » |
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OM SAI RAM SAIRAM SAISUDHAJI thanks  May Baba bless you always..... Keep posting beautiful poems..... JAI SAI RAM
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saisewika
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« Reply #47 on: September 03, 2009, 07:23:04 PM » |
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ॐ साईं राम
सबका मालिक एक
साईं नाम सुनाम के परम भाव अनेक अति उत्तम इक भाव है सबका मालिक एक
द्वैत भाव की तोड कर बीच खडी दीवार ईश सभी का एक ही बतलाया करतार
प्राणी प्राणी में करो नहीं जाति धर्म का भेद प्रेम सभी के ह्रदय बसे होवे नहीं विच्छेद
जन्म से ऊँचा कोई नहीं ना नीचा कोई धर्म ऊँचा उसी को जानिए जिसके ऊँचे कर्म
तेरा मेरा करे नहीं हिंदु या इस्लाम जन जन बाँटे प्रेम जो सज्जन वही सुजान
सम है सभी में आत्मा सम है सभी में प्राण एक ही साईं सबका है सबमें साईं मान
सबका मालिक एक है अल्लाह कहो या राम रस्ते चाहे अलग अलग सबका एक ही धाम
सागर में नदिया कई आकर के मिल जावें छोड के निज अस्तित्व को सागर ही कहलावें
ऐसे ही सब आत्मा परमात्मा का अंश एक में जाकर सभी मिलें होवें तभी अनन्त
जय साईं राम
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Gopal Krishan
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« Reply #48 on: September 04, 2009, 06:34:17 AM » |
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वाह सांई सेविका जी वाह!!!!
आप के शब्दों में बाबा सांई का वास है और आप पर सरस्वती माँ की असीम कृपा है ।
जय श्री सांई राम 
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सब का मालिक एक--सांईराम
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saisewika
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« Reply #49 on: September 08, 2009, 07:47:37 PM » |
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OM SAI RAM Thanks Gopal Krishan ji  JAI SAI RAM
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saisewika
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« Reply #50 on: September 08, 2009, 07:49:50 PM » |
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ॐ साईं राम
साईं पावन प्रेम का मुझे दीजिए ज्ञान परमात्मा से प्रेम का पाऊँ अनुपम दान
तुमसे ही बस प्रीति हो मोह माया को त्याग सच्ची लगन हो प्रभु से भक्तिमय अनुराग
तेरे प्रेम में मैं पडूँ भूल के जग के बन्ध प्रेममय रस पान करूँ पाऊँ मैं मकरन्द
तेरी प्रेम नगरी में मैं करूँ प्रेम से वास तुझ से जोडूँ नाता मैं बंधू प्रेम के पाश
तेरे प्रेम में झंकृत हों मेरे मन के तार प्रेम नाद छिड जावे तो छूटें सभी विकार
दुख आवे,सुख जावे चाहे जीवन में सौ बार तुमसे प्रीति कम ना होवे बढता जाए प्यार
तेरे प्रेम वियोग में मैं रोऊँ और बिलखूँ प्रेम पगी दृष्टि से साईं तुझको ही मैं निरखूँ
प्रियतम साईं तुम्हें लिखूँ भक्ति भाव की पाती शब्दों में हो प्रेम गंग अमृत रस बरसाती
प्रेममयी भक्ति करूँ पूर्ण भाव के संग रोम रोम हो प्रेम भरा मन में प्रेम उमंग
तुझमें श्रद्धा सबुरी ही विशुद्ध प्रेम का रूप तुझसे प्रेम विरक्त जो पडे अन्ध के कूप
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #51 on: September 10, 2009, 09:06:09 PM » |
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ॐ साईं राम
वो अक्सर मुँह अँधेरे ही चली आती थी मैं चाहूँ ना चाहूँ, मेरे पास ही मँडराती थी
मैंने कई बार उसे दुत्कारा और भगाया था पर अक्सर उसे अपने नज़दीक ही पाया था
सच बताऊँ, मैं उससे बहुत डरती थी वो आज ना आए, हर दिन दुआ करती थी
पर रोज़ की तरह, वो उस दिन भी चली आई मुझे देखा और व्यंग्य से मुस्कराई
मैंने कहा- तुम रोज़ क्यूँ चली आती हो जानती तो हो कि तुम मुझे बिल्कुल नहीं भाती हो
वैसे भी नहीं चाहिेए मुझे तु्म्हारा साथ क्योंकि मेरे साथ हरदम हैं मेरे साईं नाथ
वो बोली दिल के बहलाने को तुम्हारा ये ख्याल अच्छा है पर सच बताऊँ, साईं से तुम्हारा प्यार अभी कच्चा है
अगर ऐसा ना होता तो मैं तुम्हारे वजूद पर छा नहीं सकती थी और जिस दिल में साईं रहते हों,उसमें मैं समा नहीं सकती थी
अच्छा सच बताओ- जब तुम नहीं देखती, तब भी तुम्हारे घर में टी वी कयूँ चलता रहता है क्यूँ तुम भरम पालती हो कि तुम अकेली नहीं,तुम्हारे संग कोई रहता है
क्यूँ तुम्हारे कान दरवाज़े की घंटी पर लगे रहते हैं और क्यूँ अक्सर तुम्हारी आँखों से आँसू बहते हैं
वैसे तुम ही नहीं, बहुत से लोग मुझ से घबराते हैं और कई तो भीड में भी मुझे अपने साथ ही पाते हैं
यह कह कर तन्हाई "खामोश" हो गई, और मुझे निहारा पहली बार मुझे उसका साथ लगा अनोखा और प्यारा
उसने आज मुझे एक कडवा सच बतलाया था पल भर में ही दूर हो गया मायूसियों का साया था
मैनें कहा शुक्रिया तन्हाई, तुम्हारी बातों ने आज मुझे चेताया है और साईं साथ हों तो तुम्हारा वजूद नहीं ये सच मुझे समझाया है
अब तुम मेरे आस पास रहो मुझे फर्क नहीं पडता और तुम कहीं आ ना जाओ,ये सोच कर दिल नहीं डरता
अब मैं और मेरा साईं अक्सर, बातें करते रहते हैं और सुना है मेरे पीछे लोग मुझे दिवाना कहते हैं
जय साईं राम
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Tana
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« Reply #52 on: September 11, 2009, 04:17:39 PM » |
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ॐ सांई राम!!!
सुरेखा दीदी बहुत प्यारी होती है तन्हाई ,एक अलग सा सकुन मिलता है तन्हाई में...शायद बाबा से मिलने का सीधा टिकट कटा देती है ये तन्हाई... और दीदी,जिस रोज़ तन्हाई आती है....आकर जब दिल में जगह बनती है...अपनों की बङी याद दिलाती है..हैना.....
और
तन्हाई मुझे बङी भाती है, बाबा के ओर करीब लाती है...
जय सांई राम!!!
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« Reply #53 on: September 11, 2009, 07:54:56 PM » |
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OM SAI RAM
Ye tanhai badi ajeeb hai Annu...
pehle aakar mere kano me cheekhti thi, chilltati thi, mujhe satane me maza aata tha usse.....par ab woh meri dost hai....ab mai usse dhoondhti hoon....woh bhi ab shanti se pasar jaati hai mere aas paas....aur zariya ban jaati hai Baba ke paas jaane ka.....isi liye ab mujhe bhi tanhai bahut bhati hai.....
JAI SAI RAM
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« Reply #54 on: September 14, 2009, 06:38:55 PM » |
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ॐ साईं राम
तेरी नौकरी मुझे चाहिए हे साईं अभिराम चाकर मुझे बना लो, दे दो श्री चरणों में स्थान
चौबिस घंटे, सातों दिन की ड्यूटी मुझको दे दो बचा समय जो इस जीवन का निज सेवा में ले लो
वेतन में तुम मझको देना श्रद्धा और सबूरी इतना वेतन हो कि स्वामी तुम से ना हो दूरी
सिक्क लीव मुझे नहीं चाहिए ई एल तुम ना देना इस जीवन का हर क्षण दाता अपने नाम कर लेना
टी ए, डी ए जब हो जाए कभी ड्यू जो मेरा शिरडी धाम का लगवा देना साईं तुम इक फेरा
अप्रेज़ल के समय में दाता मेरे दोष निरखना सच्ची झूठी भक्ति को तुम साईं आन परखना
लेश मात्र भी कमी जो पाओ डिमोशन चाहे करना जैसे कर्म हो मेरे, वैसे फल से झोली भरना
बोनस में मुझको दे देना दरशन अपना प्यारा तेरी नौकरी में ही बीते मेरा जीवन सारा
प्रमोशन जब भी करना चाहो तब इतना ही करना भक्ति की ऊँची सीढी पर साईं मुझको धरना
रिटायरमेंट का समय जो आवे तुम खुद ही आ जाना इस जीव को दाता अपने सँग तुम्हीं ले जाना
अरजी मैनें डाली है, तुम इस पर करो विचार तेरी नौकरी पा जाऊँ तो हो जावे उद्धार
जय साईं राम
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« Reply #55 on: September 17, 2009, 09:47:41 PM » |
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ॐ साईॅ राम
इस जग में तुम सबसे सुंदर हे मेरे चित्त चोर तुम्हें निरख नित्त थिरके मेरे चंचल मन का मोर
गणपति जैसे मंगलदायक शुभसूचक सुखदायी करूणामयी कल्याणी मूरत तेरी साईं सहाई
सत्यवक्ता तुम राम सरीखे अति विनम्र, गंभीर सदाचारी, कोमल और निर्मल जीवनदायी समीर
रवि तेज का पुँज है मुख पर दमके स्वर्ण समान नयनों में शीतलता जैसे गगन में निकला चाँद
वैरागी शिव शंकर जैसे महासमाधि में लीन राजधिराज होकर भी रहते ज्यों दीनों के दीन
कर्मयोगी और कर्मठ ऐसे जैसे कृष्ण कन्हाई जड चेतन और सारी सृष्टि साईं में ही समाई
दुर्गा मइया जैसी ममता तव नयनों से झलके ह्रदय से प्रेम गंग की धारा भक्तों के हित छलके
तुझमें देखूँ राम कृष्ण को शिव को तुझमें ही पाऊँ ममता की मूरत मैं तुझपे वारि वारि जाऊँ
जय साईं राम
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« Reply #56 on: September 24, 2009, 10:27:59 PM » |
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ओम साईं राम
कल रात मेरे सपने में बूढा फ़कीर इक आया वेशभूषा तो बाबा सी थी पर मुख था मुरझाया
जीर्ण क्षीण थी बूढी काया दिखती थीं सब आंते आंखे डबडब भरी हुई थीं हाथ कांपते जाते
एक हाथ टमरैल थमा था कंधे पर था झोला एक हाथ में सटका था और फटा हुआ था चोला
उनकी हालत देख देख कर मन मेरा घबराया पूछा बाबा क्या कर डाला ये क्या हाल बनाया
दुखी स्वरों में बाबा बोले तुमको क्या बतलाऊं क्या क्या मुझको भक्त बोलते बतलाते शरमाऊं
कोई कहता मैनें उसको धोखा बहुत दिया है कोई कहता मेरे कारण वो पीडा में जिया है
कोई कहता मैंने उसकी झोली रक्खी खाली कोई कहता दुखी ज़िंदगी मैंने है दे डाली
कोई मर्म ना जाने मेरा कैसे मैं समझाऊं सुख दुख सब कर्मों का फल है कैसे मैं बतलाऊं
फिर भी मैं कोशिश करता हूं उनके दुख मैं ले लूं उनको जो भी कष्ट भोगने मैं ही उनको झेलूं
ऐसी बातें सुन सुन कर है फटती मेरी छाती दोषारोपण ऐसा पाकर रूह कांपती जाती
अब मैं पछताता हूं क्यों मैं इस धरती पर आया क्यों भक्तों के पाप काटने तन मानव था पाया
भक्तों ने जो घाव दिये हैं उनसे टूटा मन है पाप कर्म सब उनका ढोते बोझिल मेरा तन है
देखो उनके दुख हैं मैंने इस झोली में डाले उनको ढोते ढोते मेरे पडे पैर में छाले
अपने ऊपर दुख ओढता उफ़ ना मैं करता हूं मैं ही उनका दुख हरता हूं मैं ही सुख करता हूं
फिर भी मेरे भक्त समझते मैं दोषी हूं उनका केवल सुख ही सुख चाहता हर पल हर दिन जिनका
बाबा की यह व्यथा जानकर मन मेरा भी कांपा रोम रोम में दुख का सागर मुझमें भी आ व्यापा
बाबा के चरणों में गिरकर फूट फूट मैं रोई बाबा हमको माफ करो तुम तुम बिन और ना कोई
नहीं जानते हैं वो बाबा जो ये सब हैं कहते शायद वो घबरा जाते हैं दुख दर्द को सहते
भक्तों के मन की आखों को स्वामी तुम ही खोलो पत्ते पत्ते में कण कण में भक्ती रस को घोलो
हम तो दाता इतना चाहें कुछ ऐसा तुम कर दो जब भी हाथ पसारे दरशन चाहें ऐसा वर दो
इससे कुछ ज़्यादा ना चाहें ना धन, यश ना मान देना है तो स्वामी दे दो श्री चरणों में स्थान
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #57 on: September 24, 2009, 10:31:45 PM » |
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ॐ साईं राम
बडे दिनों के बाद कल सपनें में बाबा आए अंजलि भर श्री चरण में मैंने श्रद्दा सुमन चढाए
हाथ जोड फिर पूछा उनसे इतने दिन के बाद भक्त जनों की साईं नाथ को अब आई है याद
बाबा बोले निकल गया था मैं कुछ ज़्यादा दूर समझ रहा था खुद को मैं व्याकुल और मजबूर
शीश झुकाकर मैंने पूछा साईं ये समझा दो परम विधाता व्याकुल कैसे होते हैं बतलादो
अति मधुर वाणी में बाबा बोले हौले हौले अपने व्याकुल मन के भेद बाबा ने यूँ खोले
मेरे प्रिय भक्तों ने मुझ पर लगा दिए आरोप उनके दिल मे क्रोध भरा है और भरा आक्रोश
उनको लगता मेरे कारण वो हर दुख सहते हैं फिर भी जाने क्यूँ वो खुद को भक्त मेरा कहते हैं
अक्सर कोई इच्छा ले कर वो द्वार मेरे आते हैं अगर ना पूरी कर पाऊँ तो मुझ पर झल्लाते हैं
मन्नत में कभी कोई भक्त चरित्र पारायण करता है कभी कोई नव वार का व्रत इस हेतु धरता है
फिर मुझसे मनचाहा पाना उसका हक हो जाता है पूजा और वरों का लिक्खा भक्त जनों नें खाता है
नहीं जानते वो दुख उनका मेरा दुख होता है उनके दुख में मैं जगता हूँ जब ये जग सोता है
मैं चाहता हूँ कर दूँ मैं हर भक्त की इच्छा पूरी लेकिन ऐसा ना करने की मेरी है मजबूरी
समय से पहले,भाग्य से ज़्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता कर्मों के ग़र बीज ना हों तो कोई फूल नहीं खिलता
लेकिन मेरे भोले भक्त मुझसे है आस लगाते अपनी झोली फैलाते है मेरे दर पर आते
मैं पूरी कोशिश करता हूँ कर्म बन्ध मैं काटूँ अपने भक्तों के जीवन में ढेरों खुशियाँ बाँटू
लेकिन ऐसा ना कर पाऊँ तो ये मन रोता है भक्त समझते उनका साईं कहीं पडा सोता है
अपने भक्तों को मैं कैसे समझाऊँ ये बात हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ
सब जीवों के कर्म फलों का अपना ताना बाना है जितना जिसकी बही में लिक्खा उतना सुख दुख पाना है
इतना कह कर मौन हो गये साईं पालन हारे सबकी चिन्ता करने वाले जन जन के रखवाले
श्री चरणों में मस्तक धरकर और जोडकर हाथ सविनय अरज करी तब मैंने भक्ति भाव के साथ
गत जन्मों के कर्म बन्ध के जितने भी है भार ढोने को उन सब को साईं हम भी है तैयार
बस अब कभी दुखी ना होना साईं मेरे स्वामी हँस कर दुख सहने की शक्ति दे दो अंतरयामी
जय साईॅ राम
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Tana
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« Reply #58 on: September 25, 2009, 08:58:55 AM » |
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ॐ सांई राम!!!
सांई राम , सुरेखा दी,
कोई शब्द ही नहीं है क्या बोलूं आज शब्द-विहीन हूँ... बस ये व्यथाएँ पढ़ कर आँखे नम है और दिल में तङप है...अपनी करनी पर शर्मिदा हूँ...
बाबा की ये व्यथा पढ़, मेरा दिल तङपा, दिल पर चोट लगी कुछ ऐसी, मन से रूदन फूटा...
कब हुआ,कैसे हुआ हम से इतना बाबा को तङपाया, ना सोचा ना समझा कैसे बाबा को रूलाया...
बार बार समझाते बाबा सब कर्मों का फल है, फिर भी हर बार हमने बस बाबा को ही कोसा...
ये ना दिया वो ना दिया... हाए....मेरे सांई...मेरे करूणामयी बाबा, कैसे इतना तङपाया..... क्यों ना समझे अब तक हम, बाबा के मन की व्यथा...
आज हम सब करते वादा बस सांईमय हो जाए, रात -दिन बस सांई सांई करे ज़िन्दगी यूँ ही बिताए....
सिर्फ इतना मांगे बाबा से कि जब भी हम इस जग से जाए मन से तुझे ध्याए और मूँह से सांईराम सांईराम गाए, हाथ सदा सिर पर हो तेरा तेरे चरणों में सीस नवाए, और बस तेरे ही हो जाए....
अब हम सांईमय हो जाए...बस अब सांई मय हो जाए~~~~
बस अब कभी दुखी ना होना साईं मेरे स्वामी हँस कर दुख सहने की शक्ति दे दो अंतरयामी~~~ 
जय साईं राम!!!
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« Reply #59 on: September 26, 2009, 01:34:27 AM » |
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ॐ साईं राम
समय॰॰॰॰॰॰॰ २॰३० दोपहर दिवस॰॰॰॰॰॰॰विजयादशमी १९१८ स्थान॰॰॰॰॰॰॰शिरडी भाव॰॰॰॰॰॰॰॰॰सभी शिरडी वासियों के
सीमोंल्लंघन करके साईं चले गए तुम आज ना मुडके देखा हमको ना तुमने दी आवाज़
गरीबों का मसीहा दुखियों का था सहारा बस छोड गया देह को किया सबसे ही किनारा
कितनी ही आँखें भीगी कितने ही प्राण छूटे कितने ही ख्वाब बिखरे कितने ही सपने टूटे
ना चिडिया कोई चहकी ना फूल मुस्कुराए ग़मों के काले साऐ हर ज़िन्दगी पे छाए
दसों दिशाऐं सिसकीं पृथ्वी का सीना काँपा दुनिया के हर ज़र्रे में दुखों का सागर व्यापा
तुम चल दिए तो चल दिया दुनिया का नूर सारा चहूँ ओर ही फैला है कालरात्री का अँधियारा
वो करुणामयी आँखे आशिश में उठा हाथ श्री चरणों की शरण वो उन सब का छूटा साथ
वो भक्ति भाव लहरी हर हृदय में थी रहती शिरडी के हर कूचे में साईं नाम धुन थी बहती
मस्जिद में गूँजता वो शँख नाद न्यारा हर पल धधकती धूनि प्रवचन वो प्यारा प्यारा
कैसे जिऐंगे देवा तुम इतना तो बता दो तुम्हारे बिना जीने की तुम हमको ना सजा दो
निवेदन है तुम्हीं से ये भक्ति भाव भीना ले जाओ हमें सँग में हमको नहीं है जीना
जय साईं राम
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