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saisewika
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« Reply #20 on: May 21, 2009, 08:52:15 PM » |
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ॐ साईं राम काश अगर मैं सटका होती साईं तेरे हाथ का परम पुनीत होता ये जीवन सुख पाती तव साथ का मुझे हाथ में थामे रहते मेरे प्यारे साईं राम फिर कोई चाहत ना रहती जीवन हो जाता निष्काम कभी धरा पर पटक के सटका जल के स्त्रोत बहाते तुम अग्नि ज्वाला मद्धम होती सटका जो लहराते तुम 'सटका लीला' करते साईं निरख निरख जग सुख पाता तेरे हाथ में आकर साईं मेरा जीवन तर जाता काश अगर मैं झोला होती कन्धे पर लटकाते तुम जहां जहां भी जाते साईं मुझको भी ले जाते तुम सारे सुख दुख भक्त जनों के मुझमें तुम डाला करते बडे जतन से, समझ के संपद मझको नाथ संभाला करते काश अगर मैं कफनी होती मुझको धारण करते तुम पतित जो जीवन इस दासी का इसका तारण करते तुम कैसा पावन जीवन होता पाकर साईं संग तेरा कतरे कतरे पर चढ जाता प्रेम तेरा और रंग तेरा और जो होती तेरी पादुका श्री चरणों में रहती मैं मुझसा भाग्य नहीं किसी का ऐसा सबसे कहती मैं श्री चरणों की पावन रज को साईं निशदिन पाती मैं धारण कर मस्तक पर, अपनी किस्मत पर इतराती मैं टमरैल या भिक्षा पात्र ही होती साईं तेरी दासी तो महा पुण्य प्रताप मिल जाता नित दर्शन की प्यासी को जाने कितने क्षुधित तृषित तृप्ति आकर पा जाते कौर कौर को तरस रहे जो महाप्रसाद वो पा जाते काश अगर जो ऐसा होता धन्य धन्य हो जाती मैं पद पंकज में आश्रय पाकर चिर विश्रांति पाती मैं जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #21 on: May 26, 2009, 07:18:19 PM » |
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ओम साईं राम
अगर साईं का प्यार एक समन्दर है तो मैं इसमें डूब जाना चाहती हूं किनारे की कोई ललक नहीं मुझको मैं तो लहर बनके इसमें समाना चाहती हूं
अगर साईं का प्यार एक तपता सूरज है तो मैं इसमें झुलस जाना चाहती हूं मैं वो शै नहीं जो आग से डरूं मैं खुद को इसमें तपाना चाहती हूं
अगर साईं का प्यार एक रास्ता है तो मैं इस पर चलते जाना चाहती हूं कंकडों पत्थरों की परवाह नहीं है मुझे मैं तो रास्ते की धूल बन जाना चाहती हूं
अगर साईं का प्यार एक मन्ज़िल है तो मैं उस मन्ज़िल को पाना चाहती हूं साईं मैं तेरे कदमों में आ पडी हूं यहीं अपना आखिरी ठिकाना चाहती हूं
जय साईं राम
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« Reply #22 on: July 07, 2009, 11:16:16 PM » |
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ॐ साईं राम
गुरु शिष्य पूर्णिमा
सदगुरू साईं गुरू दिवस की आपको बहुत बधाई श्री चरणों में हमको रखना साईं सर्व सहाई
पुण्य दिवस में हमको साई बस इतना ही वर दो गुरू दिवस के संग संग इसको शिष्य पूर्णिमा कर दो
हर शिष्य के मन मंदिर में साईॅ आन विराजो दास जनों के हृदय पटल पर सूरज सम तुम साजो
शरण में अपनी राखिए सदगुरू साईं सुजान श्रद्धा और सबूरी का प्रभु दीजिए दान
भक्ति से साईं आपकी कभी ना भटके मन हर पल तुझमें रमा रहे नश्वर ये जो तन
सबके मन में सदा जले तेरे नाम की जोत प्रेम तेरे के रंग में साईं रहें ओत और प्रोत
सदगुरू की महिमा अनंत नित नित गाते जाएं प्रति दिवस हो गुरू पूर्णिमा हर दिन इसे मनाऐॅ
गुरू शिष्य की परम्परा सदा रहे अखंड ऐसा आशिश दीजिए हे श्री सच्चिदानन्द॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
जय साईॅ राम
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Tana
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« Reply #23 on: July 08, 2009, 09:33:57 PM » |
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ॐ सांई राम!!!
सुरेखा दीदी बहुत खूब लिखा है आप ने....गुरु शिष्य पूर्णिमा.... 
जिस गुरु से राह मिली, उसके प्रति श्रद्धा भक्ति का दिन गुरु शिष्य पूर्णिमा, असल में ये दिन तो है ही उसके शिष्यों का। सच्चे गुरू की महिमा अनन्त है, उसे हम दे ही क्या सकते है, बस , देने के लिए है तो सिर्फ "भाव".............
जय सांई राम!!!
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saisewika
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« Reply #24 on: July 10, 2009, 08:15:22 PM » |
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ॐ साईं राम
हाथ जोड कर शीश झुका कर साई तेरे दर पर आकर बाबा करते हम अरदास रखना श्री चरणो के पास
मागे हम आ हाथ पसारे जो हम चाहे देना प्यारे धन दौलत की नही है आस न ही राज योग की प्यास
नहीं चाहिये महल चौबारे नहीं चाहिये वैभव सारे नहीं चाहिये यश और मान ना देना कोई सम्मान
जो हम चाहें सुन लो दाता देना होगा तुम्हें विधाता खाली हम ना जायेंगे जो मान्गा सो पायेंगे
हमको प्रभु प्रेम दो ऐसा शामा को देते थे जैसा हरदम रखो अपने साथ मस्तक पर धर कर श्री हाथ
भक्ति हममे जगाओ वैसी जगाई मेधा मे थी जैसी भक्ति मे भूलें जग सारा केवल तेरा रहे सहारा
महादान हमको दो ऐसा लक्श्मी शिन्दे को दिया था जैसा अष्टांग योग नवधा भक्ति साई सब है तेरी शक्ति
सेवा का अवसर दो ऐसा भागो जी को दिया था जैसा चाहे कष्ट अनेक सहें श्री चरणों का ध्यान रहे
निकटता दे दो हमको वैसी म्हाल्सापति को दी थी जैसी प्रभु बना लो अपना दास ह्रदय में आ करो निवास
सम्वाद करो हमसे प्रभु ऐसे तात्या से करते थे जैसे सुख दुख तुमसे बांट सकें रिश्ता तुम से गान्ठ सके
महाग्यान दो हमको ऐसा नाना साहेब को दिया था जैसा दूर अझान अन्धेरा हो जीवन में नया सवेरा हो
वाणी दे दो हमको वैसी दासगणु को दी थी जैसी घर घर तेरा गान करें साई तेरा ध्यान धरें
आशिष दे दो हमको ऐसा हेमाडपंत को दिया था जैसा कुछ हम भी तो कर जाऎं साईं स्तुति रच तर जाऎं
महाप्रसाद हमको दो ऐसा देते राधा माई को जैसा हम भी पाऎं कॄपा प्रसाद शेष रहे ना कोई स्वाद
आधि व्याधि हर लो ऐसे काका जी की हरी थी जैसे शेष रहे ना कोई विकार दुर्गुण , दुर्मन दुर्विचार
मुक्ति देना हमको वैसी बालाराम को दी थी जैसी श्री चरणों में डालें डेरा जन्म मरण का छूटे फेरा
जो मांगा है नहीं असंभव तुम चाहो तो कर दो संभव विनती ना ठुकराओ तुम बच्चों को अपनाओ तुम
माना दोष घनेरे हैं बाबा फिर भी तेरे हैं दो हमको मनचाहा दान भक्तों का कर दो कल्याण
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #25 on: July 13, 2009, 03:10:28 AM » |
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ॐ साईं राम
साईं सतचरित्र
साईं सतचरित्र नाम की महागंग है एक इसमें डूब के तर गए साईं भक्त अनेक
साईं मार्ग का जान लो ये है अनुपम मोती भक्तों के जीवन में जगती इससे जगमग ज्योति
बाबाजी के जीवन की इसमें सकल है गाथा जो बांचे इसे प्रेम से सो अतिशय सुख पाता
साईं नाथ का नाम ले भाव की जोत बना लो अश्रु घी बन जाएंगे प्रेम का दीप जला लो
श्रद्धा और सबूरी से अपने मन को भर लो चिन्तन, मनन,ध्यान फिर साईं नाथ का कर लो
मन में धर के धारणा निशदिन पढो पढाओ हर अक्षर के संग में साईं साईं ध्याओ
सांयकाल या प्रातः हो जब जी चाहे पढना या फिर सप्ताह पाठ ही चाहे इसका धरना
समय हो चाहे खुशी का या आपद की घात पढो समय कट जावेगा यही सार की बात
सतचरित्र के पठन से बढे भक्ति और ज्ञान पतित आत्मा पावन हो जन का हो कल्याण
अविद्या का नाश कर काटे पाप के कर्म भवसागर से पार हो समझ गया जो मर्म
सतचरित्र के पाठ से खुले मोक्ष के द्वार जन्म मरण छूटे सभी जन का हो उद्धार
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #26 on: July 15, 2009, 10:30:49 PM » |
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ओम साईं राम
कैसे करूं तुम्हारी पूजा
कल रात मेरे सपने मे फिर से बाबा आए हाथ जोडकर खडी रही मैं जडवत शीश नवाए
बाबा बोले प्रश्न पूछ ले कर ना तू संकोच जो भी तेरे मन में है सब कह दे यूं ना सोच
श्री चरणों मे नत होकर मैं बोली मेरे स्वामी कुछ शंकाए मन में हैं सुलझाओ अंतरयामी
कैसे करूं तुम्हारी पूजा साईं ये बतलादो विधि विधान जैसे भी हों भक्तों को समझा दो
तुमको अर्पण करूं मैं बाबा कैसे हों वो फूल कोई ऐसा फूल नहीं है जिसमें ना हों शूल
धूप दीप कहां से लाऊं जिनमें सुगंध हो पूरी बिना सुगंध के मेरी पूजा रह ना जाए अधूरी
कैसे स्वर में मधुर आरती गा के तुम्हें पुकारूं कागा जैसी मेरी वाणी कैसे इसे सुधारूं
नैवेद्य बनाऊं कैसा जो हो मनभावन प्रभु तेरा स्वीकारो तुम खुशी खुशी से जो चढावा हो मेरा
इन सारे प्रश्नों को सुनकर बाबा जी मुस्काए फिर पूजा कैसी हो इसके सभी भेद समझाए
बोले मुझको नहीं चाहिए पुष्पों की कोई माला अपने मन को "सुमन" बना कर अर्पित कर दो बाला
धूप दीप या बाती की मुझे नही दरकार श्रद्धा और सबूरी ही मैं कर लेता स्वीकार
दे सको तो अपने सारे अवगुण मेरे आगे डालो सेवा और त्याग का मार्ग जीवन में अपनालो
वाणी कर लो ऐसी कि तुम जब भी मुख को खोलो हर प्राणी से मधुर स्वरों में मीठी बातें बोलो
कभी किसी का दिल ना तोडो कभी ना करो विवाद तेरे कारण किसी जीव को कभी ना होवे विषाद
सीधी सच्ची भक्ति की राह दिखलाता हूं तुझको पूजा के कोई आडम्बर नहीं चाहिए मुझको
पूर्ण भाव से नत हो कर के करो एक ही बार ऐसा श्रद्धामय वंदन मैं कर लेता स्वीकार
जय साईं राम
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dipika
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« Reply #27 on: July 16, 2009, 09:42:29 PM » |
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OMSAIRAM!Dear Sister Surekha ji........very beautifully u have described Sai Satcharitra ka paath. सतचरित्र के पाठ से खुले मोक्ष के द्वार जन्म मरण छूटे सभी जन का हो उद्धार May Sai baba bless all to always take his name and do his Sai Satcharitra ka paath.  God bless u dear..  Bow to Sri Sai! Sai baba let your holy lotus feet be our sole refuge.OMSAIRAM
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saisewika
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« Reply #28 on: July 16, 2009, 11:06:57 PM » |
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SAIRAM Dipikaji I wanted to say much much more about this supreme scripture, but words are few and my thoughts are limited.. Guruji Shri C.B.Sathpathyji has written the significance of SAI SATCHARITRA in these beautiful words:- * This is the first and foremost book based on the life-story of Shri Sai Baba, which was originally composed in Marathi verse form. The writing of the book started in the lifetime of Baba with his blessings. * The Hindi translation of this book is in simple Hindi language, which can be understood even by a common man. * The divine truth imparted by this book is even greater than the knowledge contained in the Vedas and Geeta, because all the characters and events in it are real and authentic as also recorded in details by many devotees. * Because of the _expression in simple Hindi it is easy even for every one to comprehend it. Today there are very few people who can understand Sanskrit language properly and absorb the meaning and substance easily. * The spiritual essence contained in all the religious scriptures like Vedas, Geeta, Yoga Vashisht is found in the life-story of Shri Sainath. * The concepts on God and spirituality are explained in such a simple yet comprehensive manner in 'Shri Sai Satcharitra' that no additional book, or commentary etc. is required to understand it. It has a natural flow of which the readers starts feeling as if they had been closely associated with its events in their past life. * I may mention here that the glory of Shri Sai is spreading in the world, far and wide, in such an amazing way that detailed information at the web sites on Internet about Shri Sai and 'Shri Sai Satcharitra' is available for interested readers. * The foremost duty of a Sai devotee is therefore to read 'Shri Sai Satcharitra' and absorb it by heart if possible. The more they read this book, the more it will bring them closer to Baba and all their doubts and apprehensions will be cleared. * It also has been experienced that during crisis if any devotee is searching for an answer, if he randomly opens of 'Shri Sai Satcharitra' praying Baba sincerely and with faith his answer can be found in that open page. * Many people have got their desired benefits after reading 'Shri Sai Satcharitra' for a week in a parayana form. JAI SAI RAM
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saisewika
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« Reply #30 on: July 18, 2009, 12:29:40 AM » |
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OM SAI RAM Thanks Sai Ki Rakshandaji  JAI SAI RAM
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saisewika
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« Reply #31 on: July 18, 2009, 12:39:11 AM » |
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ओम साईं राम
साईं मुझे हर पल तेरा साथ चाहिए सिर पर हमेंशा तेरा हाथ चाहिए
मेरे हर करम पर निगाह अपनी रखना मुझको हे मालिक पनाह अपनी रखना
भटकूं कभी तो तू राह दिखाना ना भूलूं तुझे ऐसी चाह जगाना
मेरा हर रस्ता तेरे दर पे पहुंचे मेरा हर कदम बस तेरे घर पे पहुंचे
आकर थाम लेना मैं गिरने लगूं जो गिराना, तेरी राह से फिरने लगूं तो
कोई लम्हा तुझसे जुदा ना हो मेरा तुझसे अलग कोई खुदा ना हो मेरा
तुझसे ना शुरु ऐसी कोई बात ना हो तुझपे ना खत्म ऐसे जज़्बात ना हो
सांसों में दिल में समाए तू रहना मेरा ये भरोसा बनाए तू रहना
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #32 on: July 20, 2009, 07:11:36 PM » |
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ॐ साईं राम
साईं अपरम्पार तुम शिवजी के अवतार तुम
भक्त जनों का करने तारण मानव चोला कर लिया धारण
धरती पर उतरे कैलासी बन कर देवा शिरडी वासी
विरक्ति वही विराग वही था नवजीवन पर त्याग वही था
त्रिशूल छोड कर सटका थामा जटाधारी ने पटका बांधा
व्याघ्र चर्म को छोड़ के दाता कफनी धारण करी विधाता
त्याग कमंडल पकडा टमरैल सबके दिल का धोते मैल
शिव साईं ने मांगी भिक्शा मालिक एक की देते शिक्शा
जटा की गंगा चरण में लाए भक्त जनों का मन हरषाए
तन की भस्म की करी विभूति स्वंय हाथ से देते ऊदि
मृगछाला का छोड बिछोना शुरु किया तख्ते पर सोना
उसके भी टुकड़े कर डाले शिव साईं के रंग निराले
वीतरागी थे महा अघोरी सबके दिल की करते चोरी
अमृत छोड के विष पी जाते भक्तों का हर दुख अपनाते
शिवशंकर साईं भगवान कोटि कोटि है तुम्हें प्रणाम
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #33 on: July 22, 2009, 07:52:21 PM » |
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ॐ साईं राम
बस इतना ही मांगा है साईं तेरी दासी ने पावन चरणों की धूलि ने शुभ दर्शन की प्यासी ने
साईं अपने भक्त जनों में मुझको भी शामिल कर लो सच्ची भक्ति मैं कर पाऊँ देवा मुझको ये वर दो
जग की कोई आशा तृष्णा मुझे ना विचलित करने पाए वैभव या कोई महा प्रलोभन साईं कभी ना मुझे लुभाए
"मैं" मर जाए साईं मेरा अहम भाव का नाश हो पर निंदा कर पाऊँ किसी की ऐसा ना अवकाश हो
भक्ति का दिखावा ना हो आडम्बर में पडूं नहीं जो भी तुमने शिक्षा दी है जीवन में बस करूँ वही
नाम तेरे की जोत अखंड से मन का दूर अंधेरा हो ज्ञान चक्षु खुल जाएं मेरे जीवन मे नया सवेरा हो
मुझमें और तुझमें हे साईं अब ना कोई दूरी हो क्षण भर भी मैं भूलूं तुझको ऐसी ना मजबूरी हो
आगम, अस्तित्व, अस्त मेरा तुझसे ही बस जुडा रहे कभी किसी क्षण जीव मेरा तुझसे ना कभी जुदा रहे
शांत भाव , एकांत वास में साईं तुझको ध्याऊँ मैं ध्याता तू है, ध्येय भी तू ही साईं तुझको पाऊँ मैं
गत जन्मों के सारे बन्धन दाता अब तो तोडो तुम अधम जीव को पार लगा दो बीच भंवर ना छोडो तुम
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #34 on: July 27, 2009, 09:22:43 PM » |
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ॐ साईं राम
मुझे भरोसा है तेरा हे साईं अभिराम तपता सूरज सिर पर हो या ढलती हो शाम
पूरा है विश्वास कि तुम हो मेरे साथ जो मैं गिर भी जाऊँ तो तुम्ही संभालो नाथ
विपदा का चाहे समय हो या कष्ट हो घोर मुझे भरोसा है साईॅ तुम हो मेरी ओर
बीच अकेला छोड दें सारे बंधु सुजान तुम ना मुझ को छोडोगे मेरे साईं राम
आधि व्याधि तू हरे तू ही दोष निवारे मुझे भरोसा है साईं तू मुझे करे किनारे
मुझसे पहले जान ले क्या हित में है मेरे पूर्ण भरोसा मैं करूँ साईं करुणाप्रेरे
काल कराल खडा रहे चाहे मेरे द्वारे तेरे भरोसे जीवन है तू मारे या तारे
मेरा भरोसा रहे अटल दिन दिन होवे गहरा इस जीवन पर सदा रहे श्री साईं का पहरा
एकांत वास में बैठ कर सात समन्दर पार तेरे भरोसे मैं जिऊँ हे सच्ची सरकार
जय राम साईं
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Tana
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« Reply #35 on: July 29, 2009, 06:32:12 PM » |
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ॐ सांई राम!!!
दीदी इस बार फिर आप की कविता पढ़ कर मज़ा आ गया.............आनन्द..............
रख भरोसा सांई पर किए जा अपना काम, लेकर सांई का नाम शुभ बस जपे जा सांई राम सांई राम सांई राम~~~
जय सांई राम!!!
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saisewika
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« Reply #36 on: July 30, 2009, 01:28:54 AM » |
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ॐ साईं राम
बहुत कुछ कहना है तुमसे बाबा पर कह नही पाती हूँ अक्सर शब्दों का पीछा करते करते थक सी जाती हूँ
बैठ जाती हूँ फिर यूँ ही चुपचाप, गुमसुम तभी होले से,पीछे से आ जाते हो तुम
कुछ नईं पँक्तियां मेरे कानों मे गुनगुनाते हो शब्दों के ताने बाने मुझे तुम सुनाते हो
थमा देते हो लेखनी फिर मेरे हाथों में चढ जाते हैं कई शब्द ज़िन्दगी के खातों में
तुम्हारी मीठी सी महक लेकर फिर नई कविता उभर आती है बस यूँ ही तेरे ख्यालों में ये उम्र गुज़री जाती है
जय साईं राम
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Gopal Krishan
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« Reply #37 on: July 30, 2009, 09:47:33 AM » |
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वाह वाह सांई सेविका जी । मेरे सांई की बङी रहमत है आप पर ।
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सब का मालिक एक--सांईराम
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saisewika
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« Reply #38 on: July 30, 2009, 10:26:21 PM » |
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OM SAI RAM SAIRAM Gopal Krishan ji Thanks  JAI SAI RAM
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saisewika
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« Reply #39 on: July 30, 2009, 10:29:38 PM » |
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ओम साईं राम
नमो नमो हे परम दयालु नमो नमो हे देव शरण लगाकर अपनी स्वामी रक्षा करो सदैव
नमन करूं मै तन से मन से निस दिन आठों याम स्वीकारो हे साईं नाथा रक्खो अपने धाम
नमन करूं मैं पल पल, क्षण क्षण श्वास श्वास के साथ सिमरम की माला के संग संग नमन तुम्हें हो नाथ
नमन करूं हे परम त्यागी अंखियन में भर नीर कभी ना बिसरो भक्तों को तुम जानो मन की पीर
नमन करूं मैं नख से शिख तक दस दिश मस्तक टेक सब भक्तों का एक ही साईं सबका मालिक एक
नमन करूं मै सोते जगते हंसते रोते स्वामी कभी ना बिसरूं वर ये दे दो साईं अंतरयामी
नमो नमो हे साईंनाथा नमो नमो हे ईश शरण लगा लो, दरस दिखा दो अपना लो जगदीश
जय साईं राम
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