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saisewika
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« on: March 13, 2009, 11:08:06 PM » |
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ओम साईं राम
मेरा जी चाहता है साईं तेरी करती रहूं बढाई
अलंकरण जितने दुनिया में सजाऊं तेरे चरण कमल में
तेरा ही गुणगान करूं तेरा ही मैं ध्यान धरूं
तुझसे ही मैं प्रीत लगाऊं तुझसे ही अपनापन पाऊं
हर सांस जो आवे जावे संग संग तेरी महिमा गावे
रोम रोम से साईं ध्याऊं सपनों में तुझको ही पाऊं
सुबह दोपहर शाम और रात करती जाऊं तेरी बात
चौबिस घंटे सातों दिन जी ना पाऊं तेरे बिन
पल पल क्षण क्षण आठों याम मुझको दीखो साईं राम
सोवूं जागूं खाऊं पीऊं तुझको बस तुझको ही जीऊं
थकूं ना लेती तेरा नाम यूं ही हो जीवन की शाम
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #1 on: March 15, 2009, 12:38:32 AM » |
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ॐ साईं राम
नहीं आज कुछ नहीं चाहिए ऐसा कहता है ये मन बस श्रद्धा से नतमस्तक हो तुमको करना चाहूं नमन
कुछ ना मांगू, कुछ ना चाहूं ना कोई अभिलाषा हो ना ही इच्छा ना ही तृष्णा ना ही कोई आशा हो
निर्मल मन और सत् चित लेकार साईं के सन्मुख जाऊं प्रेम पूर्वक हाथ जोङकर श्री चरणों में झुक जाऊं
द्वैत भाव का करूं समर्पण अहंकार को त्यागूं मैं महा गर्त में पङी हुई सी चिर निद्रा से जागूं मैं
नयनों में प्रेमाश्रु, ह्रदय में श्रद्धा और सबूरी हो अनन्य भाव हो प्राप्त गुरू से फिर ना कोई दूरी हो
साईं नाम हो मुख में मेरे देव छवि ही हो दिल में साईं साईं ध्याती जाऊं शुभ घङी या फिर मुशकिल में
बस श्रद्धामय भक्ति भावमय एक नमन बस एक नमन स्वीकारो हे नाथ स्वीकारो सुजला सुफला हो जीवन
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #2 on: March 16, 2009, 09:16:07 PM » |
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ओम साईं राम
साईं सुमिरन जो करे, सो साईं को पाय जन्म मरण छूटें सभी, भवसागर तर जाय
साईं सुमिरन से मिले, श्रद्धा और सबूरी श्री चरणों मे जगह मिले,मिट जाय सब दूरी
साईं सुमिरन भजन से, बढे भक्ती विश्वास साईं मे ही जा मिले जो साईंं का दास
साईं सुमिरन ध्यान से, मोह माया सब छूटे परम सत्य का ग्यान हो, जग के बंधन टूटे
साईं सुमिरन नाव है, इसमें हो जो सवार सहज हाथ में थाम ले, भक्ती की पतवार
साईं सुमिरन डोर है, साईं से जो जोडे प्रेम करे सब जीवों से, भेदभाव सब छोडे
साईं सुमिरन इक रास्ता, इस पर चलते जाओ श्वास श्वास से सिमर कर, साईं मंज़िल पाओ
साईं सुमिरन नदी है, डूबो गोते खाओ निर्मल पावन मन होवे, मल विमुक्त हो जाओ
साईं सुमिरन जोत है जिसके मन में जागे जीवन में उजियारा हो घोर अंधेरा भागे
साईं सुमिरन सीढी है, निशदिन चढते जाओ साईं खडे हैं बांह फैलाए, उनमें आन समाओ
जय साईं राम
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Sukhmani
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« Reply #3 on: March 17, 2009, 04:29:24 PM » |
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SaiRam Surekha ji, too good.. I 'm speechless.... MAY SAI NATH always bless you with his kripadrishti....
The remembrance of SAI is the highest and most exalted of all. In the remembrance of SAI, many are saved. In the remembrance of SAI, thirst is quenched. In the remembrance of SAI, all things are known. In the remembrance of SAI, there is no fear of death. In the remembrance of SAI, hopes are fulfilled. In the remembrance of SAI, the filth of the mind is removed. The Ambrosial Naam, the Name of the Lord, is absorbed into the heart. SAI abides upon the tongues of His Saints. SAI is the servant of the slave of His slaves.
SAI RAM
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 "We have to reap now the fruits of what we sow in our past lives, and there is no use in crying "-Sri Saibaba
Love, Grace, Protection and Blessings of Sadguru SaiBaba be on All !!!
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« Reply #4 on: March 17, 2009, 09:49:12 PM » |
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OM SAI RAM
Thank you Sukhmaniji for your praising words. Its all Baba's inspiration and will.
JAI SAI RAM surekha
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« Reply #5 on: March 17, 2009, 09:50:36 PM » |
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ओम साईं राम
सुन लो नाथ हमारी विनती नाम जपें जब, भूलें गिनती
शिरडी का लगवा दो फेरा प्रभु बना लो अपना चेरा
मन मंदिर में साईं साजो हृदय में आ नाथ विराजो
मैं और मेरा साईं प्यारा केवल तेरा रहे सहारा
भक्ति भाव हृदय में भर दो नित दरशन पाऊं ये वर दो
वाणी में रस भर दो स्वामी तुम्हें पुकारूं अंतर्यामी
शब्दों का भी दे दो दान तेरा कर पाऊं गुणगान
कभी थकूं ना ध्याते तुझको तुम बिन कुछ ना रूचे मुझको
जब भी मैं मुख अपना खोलूं केवल साईं साईं ही बोलूं
बिलख बिलख कर तुझे पुकारूं मन मंदिर में तुझको धारूं
ऐसा वर दे दो हे दाता तुझसे जोडूं सच्चा नाता
दुनिया में मैं रहूं जहां भी साईंनाथ को पाऊं वहां ही
साईं खींचो मेरी डोर वृत्ति मोडो अपनी ओर
जनम जनम में तुझको पाऊं साईं तेरे सदके जाऊं
जय साईं राम
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« Reply #6 on: March 18, 2009, 10:07:30 PM » |
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ॐ साईं राम
साईं नाथ का आशीर्वाद है ऊदी बाबाजी का प्रसाद है ऊदी
त्याग का पाठ पढाती है ऊदी वैराग का ज्ञान कराती है ऊदी
बीमार की संजीवनी दवा है ऊदी भक्तो को बाबा की दुआ है ऊदी
मुश्किलों में सहारा देती है ऊदी डूबते को किनारा देती है ऊदी
श्रद्धालु के माथे का टीका है ऊदी जीवन जीने का तरीका है ऊदी
बाबा पर बच्चो का विशवास है ऊदी साईं भक्तो के लिए बहुत ही ख़ास है ऊदी
देवा के प्यारो की पूंजी है ऊदी असंभव से कामो की कुंजी है ऊदी
साईं के संग का एहसास है ऊदी उनसे निकटता का आभास है ऊदी
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #7 on: March 27, 2009, 11:18:35 AM » |
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ओम साईं राम
बाबा जी के दोहे----------
मन्दिर मस्जिद जोड के द्वारका देइ बनाय सबका मालिक एक है साईं दियो समझाय
गोदावरी के तीर की महिमा दस दिस छाई प्रभु स्वयं ही प्रगट हुए नाम धराया साईं
तीन वाडों के बीच में हरि करते विश्राम तांता भक्तों का लगा शिरडी बन गई धाम
हिन्दु हैं या यवन हैं बाबा नहीं बतलाए जैसी जाकी भावना तैसो दरशन पाए
चन्दन उत्सव जोड दिया रामनवमी के संग हिन्दु मुसलिम प्रेम का खूब जमा फिर रंग
पाप ताप संताप का करने हेतु अंत बाबा चक्की पीसते देखे हेमाडपंत
चक्की में आटा पिसा मेढ दियो बिख्रराय शिरडी से सभी व्याधी को साईं दियो भगाय
पोथी पढे नहीं होत है अग्यानी को ग्यान सदगुरु जिसके ह्रदय बसे ताको ग्यानी जान
द्वारकामाई की गोद मे बैठो कर विश्वास सबके पापों का माई कर देती है नाश
समाधि मंदिर की सीढी पर रख देते जो पांव उनके जीवन दुख का रहे ना कोई ठांव
सब जीवों में देखे जो साईं राम का वास उसके ह्रदय में साईं आप ही करे निवास
दास गणु क्यूं जात हो प्रयाग काशी आप गंगा जमना यहीं रहे श्री चरणों में व्याप
तेली तुमने दिया नहीं साईंनाथ को तेल पानी से दीपक जले लीला के थे खेल
चोलकर शक्कर छोड के जोडे पाई पाई अंतरयामी साईं ने कर दीन्ही भरपाई
जो जन की निंदा करे ऐसो ही गति पाए जैसे कूडा ढेर से शूकर विष्ठा खाए
पूजन चिन्तन मनन का जो करता अभ्यास साईं उसके साथ हैं साईं उसके पास
मर्म दक्षिणा जान लो पूरा लो पहचान कर्मबन्ध के काटने साईं लेते दान
नश्वर ये संसार है मोह माया को त्याग यही बताने को साईं ऊदी दियो परसाद
धूप दीप का थाल ले जोग खडे प्रभु द्वार तांत्या चंवर ढुला रहे नाना है बलिहार
जय साईं राम
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Sukhmani
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« Reply #8 on: March 27, 2009, 11:43:47 AM » |
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Thanks SAI NATH for reading sauh a nice dohas & poems......
Again Speechless.............. Thanks Surekha ji for all of us with your wonderful poems . We can learn a lot from your poems. Your poems are great service. SAI NATH has blessed you with this wonderful Gift and We all thank SAI NATH for making you part of our Sai-Ka-Aangan family. Thank you for bringing so much enrichment in our lives.
JAI SAI RAM
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 "We have to reap now the fruits of what we sow in our past lives, and there is no use in crying "-Sri Saibaba
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« Reply #9 on: March 27, 2009, 12:13:23 PM » |
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OM SAI RAM
Thank you again for your kind words.
I am only an instrument, and write only what Baba dictates me to pen down.
JAI SAI RAM surekha
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« Reply #10 on: April 14, 2009, 11:01:29 PM » |
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ॐ साईं राम
मेरा जी चाहता है साईं तेरा मैं गुणगान करूं जहां भी कोरा कागज़ देखूं लिख लिख तेरा नाम भरूं
आसमान पर साईं लिख दूं सूरज की किरणों से मैं नाम तेरा फिर गूंज उठे भूतल के हर कण कण में
सागर की लहरों पर जाकर बिखरा दूं मैं साईं नाम दूर दूर तक जहां नज़र हो वहीं पे देखूं तेरा धाम
हवाओं और फिज़ाओं पे लिख दूं साईं नाथ मैं नाम तेरा चमन में खुशबू बन कर फैले जयघोष तेरा जयनाद तेरा
ज़र्रे ज़र्रे में भर जाए साईं नाम का ही स्पंदन पुलकित होकर दर्शन पाऊं हर पल तेरा हो चितरंजन
साईंमय ये सृष्टि सारी देखूं यहां वहां चहूं ओर नज़रों से ओझल ना होना मेरे चंचल चित्त के चोर
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #11 on: April 17, 2009, 09:49:30 PM » |
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ओम साईं राम
साईं तुम बिन जीवन जीना जीते जी हलाहल पीना
बिन पंछी ज्यों पिंजरा खाली व्यंजन बिन ज्यों रीती थाली
ज्यों कुमकुम बिन लगे सुहागन तुलसी बिन ज्यों लगता आंगन
जल बिन ज्यों हो सूखा झरना बिन मतलब ज्यों बातें करना
ज्यों चंदा बिन रहे चकोर बिन पंखों ज्यों नाचे मोर
बिन खुशबू ज्यों कोई फूल शिव मूरत बिन ज्यों त्रिशूल
कमल रहित ज्यों हो तालाब लवण बिना ज्यों होवे साग
बिन आभूषण ज्यों हो नार रंग बिना होली त्योहार
बिन जल के ज्यों गागर भरना बिन भावों के पूजा करना
बिना देव के ज्यों देवालय बिन शिक्षक के ज्यों विद्यालय
बिन राजा के ज्यों हो राज सुरों बिना ज्यों होवे साज
ऐसे साईं बिना तुम्हारे जीवन अर्थहीन है प्यारे
बेमतलब है,दिशा विहीन है तुम बिन जीवन प्राण हीन है
साईं समझो मन की पीर विनती करते भक्त अधीर
हमसे तुम ना रहना दूर जीवन में आ बसो हुजूर
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #12 on: April 20, 2009, 08:35:20 PM » |
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ऒम सांई राम
ये जो नश्वर काया है इसकी अद्भुत माया है मानों तो ये सब कुछ है जान लो तो छाया है
चाहो तो जगत मिथ्या में तुम राग रंग में मस्त रहो या फिर खुद को पहचानो श्री चरणों में अलमस्त रहो
चाहो तो इस पर मान करो इस रूप पर अभिमान करो पर इसने तो ढल जाना है इस सच पर थोडा ध्यान धरो
वात्त, पित्त और कफ़ से दूषित ऐसी नश्वर काया को साईं नाम से निर्मल करके जानो ठगिनी माया को
तो चलो क्षणभंगुर काया को साईं नाम कर देते हैं अंग अंग में साईं नाम की भक्ती को भर लेते हैं
पांच इन्द्रियां केन्द्रित हो जायें बाबा जी के ध्यान में पांचों प्राण बाबा जी को मन्जिल अपनी मान लें
ह्रदय को सुह्रदय कर लो मन को करो सुमन फिर बाबा को अर्पण करके पावो नाम का धन
बुद्दि को सद बुद्दि कर लो चित्त को सत्चिदानन्द धृत्ति धारणा धार के पावो परमानन्द
पलक उठे जब जब भी अपने बाबा जी का दर्शन पाये पलक झुके तो मन मन्दिर में बाबाजी को बैठा पाये
मुख से जब कुछ बोलें तो साईं नाम ही दोहरायें कानों से कुछ सुनना हो तो साईं नाद ही सुन पायें
हाथ उठें तो जुड जायें श्री चरणों में भक्ती से कारज करते साईं ध्यायें बाबा जी की शक्ती से
पांव चलें तो मन्ज़िल उनकी बाबा जी का द्वारा हो पांव रुकें तो ठीक सामने मेरा साईं प्यारा हो
रसना का रस ऐसा हो जाये साईं नाम में रस आये बैठे, उठते, सोते, जगते साईं जी का जस गायें
सांस सांस जब आवे जावे, साईं का अनहद नाद हो अंत समय जब सांस रुके तो साईं जी की याद हो
ऐसे काया पावन होगी मन मन्दिर हो जावेगा साईं याद में डूबा प्राणी साईं में मिल जावेगा
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #13 on: April 24, 2009, 09:27:23 PM » |
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ॐ साईं राम
अति पुनीत है,पावन है, है परम सुखदायी शिरडी धाम में बाबाजी का स्थल है द्वारकामाई
साठ बरस तक यही बनी थी बाबा जी का द्वारा भक्ति रस की बहती रहती यहां निरंतर धारा
हिंदु मुस्लिम सबको आश्रय देती मस्जिद माई राम रहीम को जोड दिया था साईं सर्वसहाई
कभी नमाज़ की अजान गुंजाकर मस्जिद इसे बनाया दीपों से कभी जगमग करके मंदिर यहीं बनाया
रामलला का यहीं पडा था पलना सजा सजाया चन्दन उत्सव भकतजनों ने हिलमिल यहीं मनाया
यहीं बैठकर बाबाजी ने जल से दीप जलाए लीलाधर की लीला के सबने सुख थे पाए
यहीं साईं नाथ जी ने श्री चरणों से गंग बहाई धन्य किया भक्तों को, तीरथ बन गई द्वारकामाई
चक्की पीसी, शिरडी की सीमा पर आटा डाला द्वारकामाई में बैठा फकीर वो सबका है रखवाला
कर कमलों से बाबाजी ने धूनि अलख जलाई इसी से उपजी ऊदि की महिमा दस दिश छाई
भक्तजनों की काशी है ये मस्जिद माई महान यहां पे आकर मिट जाते हैं झंझावत तूफान
इसकी महत्ता का बाबा ने स्वयं किया गुणगान श्री मुख से साईं जी ने आप दिया फरमान--
"द्वारकामाई की गोदी में जो बैठेगा आकर दुख दर्द सब मिट जावेंगे होगा जीव उजागर"
"द्वारकामाई की सीढी पर जो रख देता पांव उसके जीवन में फिर दुख का नहीं रहे कोई ठांव"
इसके कण कण में बसते हैं सबके प्यारे साईं जिसको दर्शन पाने हो आ जाए द्वारकामाई
जय साईं
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saisewika
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« Reply #14 on: April 26, 2009, 12:21:58 AM » |
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ओम साईं राम
बाबा जी के कुछ और दोहे.............
जो दूजे को पीडा देवे कष्ट पहुंचावे मोहे जो खुद ही पीडा को झेले सो ही मोको सोहे
ज्यों नदिया सागर मे मिलती होती एकाकार त्यों भक्त आ मुझ मे मिलते तज के ये संसार
जिन भक्तों के लिए सदा है शिरडी तीरथ स्थान सहज भाव से उन भक्तों का हो जाता कल्याण
साईं नाथ प्रभु अनुकम्पा हर कोई सकत ना पाय बौर लगें कई वृक्ष पर कुछ सड कुछ झड जाएं
भूखे को भोजन देवे प्यासे को दे पानी राही को आंगन देवे सो भक्त साईं का जानी
सब जीवों में साईं का करे जो साक्षात्कार उसके पूजा अर्चन को साईं करे स्वीकार
ये काया है पिंजरा पंछी आत्माराम मुक्त करेंगे बावरे तुझको साईं राम
काया से माया जुडी पर ये माया अच्छी इस माया को पाय के कर ले भक्ती सच्ची
सात समंदर जाय के भक्त भले बस जाय साईं खीचे डोर तो पंछी उड उड आय
नीर दिखे ना दूध में पवन ना देखें नैन घट घट साईं जान ले पा जावेगा चैन
नाविक पर विश्वास कर नदिया करते पार साईं हाथ में दे डालो जीवन की पतवार
सभी चतुरता छोड दो साईं साईं ध्याओ भव सागर से पार हो जग से मुक्ति पाओ
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #15 on: April 29, 2009, 08:31:50 PM » |
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ॐ साईं राम
साईं मेरे करुणाप्रेरे तुम पारस हम लोहा संग लगाकर मोल बढ़ा दो अधम जीव का देवा
साईं स्वामी अन्तर्यामी तुम पानी हम मीन दूर करो ना ख़ुद से देवा मर जाएँगे दींन
साईं दाता परम विधाता हम थके पिथक तुम तरुवर चरण शरण में दे दो स्थान दया करो हे गुरुवर
दत्त दिगंबर पीर पैगम्बर हम चातक तुम बादल भक्ती रस की बूँद गिरा दो खड़े फैलाये आँचल
दया निधान पुरुष महान हम मलयुत तुम गंगा निर्मल कर दो पावन कर दो हे श्री सिच्च्दान्न्दा
जय साईं राम
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« Reply #16 on: May 03, 2009, 12:20:16 AM » |
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ओम साईं राम कल मेरे चंचल से चित्त ने फिर से भरी उडान जिस आंगन में जाकर उतरा ना था वो अन्जान जो भी इसने देखा सोचा उसे स्वप्न ही कह लो संग संग मेरे ख्वाब देख लो भक्ती भाव में बह लो मैंने देखा मै पहुंची हूं बाबा जी के धाम भक्त जनों से घिरे हुए थे साईं जी अभिराम बापू जोग जी कर रहे थे आरती की तैयारी द्वारकामाई में उमडी थी शिरडी की जनता सारी तात्या बैठे बाबा जी के दबा रहे थे पांव भागो जी छाते से करते सिर पर ठंडी छांव म्हालसापति ने उनके मुख में बीडा पान का डाला बूटी जी ने उन्हें ओढाने शेला एक निकाला शामा जी कुछ परेशान से दिखते थे गंभीर बाबा थके हैं यही सोच कर होते थे वो अधीर हाथ जोडकर शीश नवाए मैं भी वहीं खडी थी एकाएक बाबा की दृष्टि मुझ पर आन पडी थी बाबा जी ने नाम मेरा ले मुझको पास बुलाया कानों में कुछ शहद सा टपका रोम रोम लहराया धीरे से मैं कदम बढाती चली साईं की ओर मन मयूर मेरा खुश था इतना जिसका ओर ना छोर आंखो से गिरते थे आंसू काया कांप रही थी सच है या सपना है कोई इसको भांप रही थी बाबा जी के पास पहुंच कर मैंने शीश नवाया आशिश मुद्रा में बाबा ने अपना हाथ उठाया आंखे बंद थीं हाथ जुडे थे मुख पर था साईं नाम डर था आंख खुली तो ओझल ना हों साईं राम जाने कितनी देर रही मैं वैसे आंखे मीचे साईं के पद पंकज मैनें इन अंसुअन से सींचे सपना है तो इसको सपना रहने दो करतार नहीं जागना मुझे नींद से हे मेरे सरकार हे साईं रहने दो मुझको निज चरणों के पास हर क्षण दरशन तेरा पाऊं पूरी कर दो आस  जय साईं राम
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« Last Edit: May 03, 2009, 12:22:27 AM by saisewika »
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saisewika
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« Reply #17 on: May 06, 2009, 11:30:07 PM » |
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ओम साईं राम
सूर्यकिरण"
आज सुबह सवेरे मेरी खिडकी के परदे को सरकाकर अन्दर आ गई वो यूं ही बल खाकर
उसकी झिलमिल रोशनी में मेरी आखें चौंधियांयी वो मुझे देख मुस्कुराई लहर सी लहराई मेरे गालों को छुआ और ज़ोर से खिलखिलाई
मैं अधमिची उनींदी आधी सोई आधी जागी बिस्तर से उठी और उसके पीछे भागी
वो नटखट सी छोटी बाला सी इतराती बाहर लान की हरी घास पर छितराती
बर्ड बाथ के ठंडे पानी पर जा बैठी पानी में इन्द्रधनुष सा बना कर वो ऐंठी
टुकुर टुकुर उसे ताकती थी मैं हैरां सोचती थी कहां से आई है ये शैतां
यूं तो वो रोज़ सुबह चली आती थी पर ऐसे तो इतना कभी ना इतराती थी
ना जाने आज इसको क्या ऐसा हुआ है जिसने यूं इसके दिल के तारों को छुआ है
"सुनो" कहकर मैने उसको जो रोका "सूर्यकिरण" कहकर उसे मैंने टोका
रुकी वो, थमी वो फिर से मुस्कुराई अपनी खुशी की उसने वजह जो बताई
उसे सुनकर मैं भी दिवानी हुई हूं खुद से ही मैं खुद बेगानी हुई हूं
वो बोली सुनो आज सुबह सबसे पहले साईं के दरस मैंने पाए रुपहले
सबसे पहले शिरडी में उतरी थी जाकर धन्य हुई बाबा की अनुकम्पा पाकर
समाधी मन्दिर की खिडकी पे जाकर पडी मैं बाबा के चरणों मे जाकर गिरी मैं
कैसा अद्भुत सा सुंदर अनुभव मैने पाया पहली किरण का आज नशा मुझपे छाया
बाबा के भक्तों को बतला रही हूं इसीलिए आज इतना मैं इतरा रही हूं
जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #18 on: May 11, 2009, 06:17:05 AM » |
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ॐ साईं राम साईं प्यार तुम्हारा साईं प्यार तुम्हारा मुझको कर देता है मतवाला अपने प्रेम के रंग में साईं तन मन तुमने रंग डाला कभी कभी शब्दों में ढलकर ये प्यार गीत बन जाता है कभी कभी मरहम बन जाता मुझे आन दुलराता है कभी सपनों की नगरी में ये हाथ थाम ले जाता है साईं प्यार तुम्हारा मुझको शिरडी तक पहुंचाता है कभी कभी ये सावन बन कर चहुँ ओर छा जाता है मेरे मन के आँगन में ये रिम झिम मेह बरसाता है कभी पवन का झोंका बन कर तन मन शीतल करता है प्राण हीन सी पडी हुई में नव जीवन ये भरता है कभी कभी पर प्यार तुम्हारा मुझको यूँ तरसाता है तुमको कान्हा, विरह में मुझको मीरा सा कर जाता है जय साईं राम
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saisewika
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« Reply #19 on: May 17, 2009, 12:21:10 AM » |
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ओम साईं राम
जब मन मेरा अकुलाता है मुझे ध्यान तुम्हारा आता है तुम आओगे मुझे थामोंगे कोई कानों मे कह जाता है
जब आशाएं सब छूटती हैं जो बंधी उम्मीदें टूटती हैं मैं याद तुम्हे कर लेती हूं मन हर मुशकिल सह जाता है
जब सुख में साथी कई मिले दुख आते ही सब छोड चले मैं दर्द सभी पी जाती हूं बस ध्यान तेरा रह जाता है
मैं जब भी ठोकर खाती हूं चलते चलते थक जाती हूं किसी मोड पे तुम मिल जाओगे विशवास मेरा गहराता है
जय साईं राम
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